Class 9 hindi chapter 8 notes and book solutions

रैदास के पद
कक्षा 8 हिंदी | काव्य खंड | अध्ययन सामग्री एवं पूर्ण अभ्यास-पत्र
नाम: कक्षा/वर्ग: दिनांक:
अध्याय-सार
रैदास के पदों का मुख्य भाव: रैदास ईश्वर के प्रति अटूट प्रेम, विश्वास और समर्पण की भावना व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार सच्ची भक्ति मन की निष्ठा और आराध्य से गहरे संबंध में है।

संत रविदास या रैदास का जन्म काशी में हुआ माना जाता है। वे भक्ति-काल के प्रमुख संत कवियों में गिने जाते हैं। उन्होंने बाहरी आडंबरों के स्थान पर मन की शुद्धता और सच्ची भक्ति को महत्व दिया।

पहले पद में रैदास ने भक्त और आराध्य के संबंध को चंदन-पानी, बादल-मोर, दीपक-बाती और मोती-धागे जैसे उदाहरणों द्वारा समझाया है।

दूसरे पद में वे कहते हैं कि वे तीर्थ और व्रत छोड़ सकते हैं, लेकिन प्रभु के चरणों की भक्ति नहीं छोड़ सकते। इससे उनकी दृढ़ आस्था और आराध्य के प्रति अटूट विश्वास प्रकट होता है।

याद रखें: रैदास के पदों के प्रमुख भाव हैं — अनन्य भक्ति, समर्पण, विश्वास, दृढ़ निष्ठा, प्रेम और आराध्य से अटूट संबंध।
पद — पूर्ण पाठ

पद (1)

अब कैसे छूटै राम रट लागी। प्रभुजी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी। प्रभुजी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा। प्रभुजी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती। प्रभुजी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा। प्रभुजी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।

पद (2)

जो तुम तोरौ राम मैं नहि तोरौ, तुम सौं तोरि कवन सौं जोरौ। तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा। जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव और नहीं दूजा। मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरौं। सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
संक्षिप्त नोट्स

1. संत रैदास

  • रैदास भक्ति-काल के संत कवि थे।
  • उनका जन्म काशी में माना जाता है।
  • उन्होंने बाहरी आडंबरों का विरोध किया।
  • उन्होंने मन की शुद्धता और सच्ची भक्ति को महत्व दिया।
  • उनकी भाषा सरल और लोकधर्मी ब्रजभाषा है।

2. पहले पद का भाव

भक्त और भगवान का संबंध बहुत गहरा और अटूट है। रैदास स्वयं को भगवान का दास मानते हैं और पूर्ण समर्पण व्यक्त करते हैं।

3. दूसरे पद का भाव

रैदास का अपने आराध्य से ऐसा अटूट संबंध है कि वे अन्य धार्मिक कर्मकांडों की अपेक्षा प्रभु के चरणों की भक्ति को अधिक महत्व देते हैं।

4. प्रमुख प्रतीक

प्रतीकभाव
चंदन — पानीभक्त और आराध्य का घनिष्ठ संबंध
घन — मोरप्रेम और आकर्षण
दीपक — बातीएक-दूसरे के बिना अधूरापन और प्रकाश
मोती — धागाअटूट जुड़ाव
स्वामी — दासपूर्ण समर्पण

5. अलंकार

अलंकारउदाहरणपहचान
अनुप्रास“प्रभुजी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”वर्णों की पुनरावृत्ति
उपमा“प्रभुजी तुम मोती, हम धागा…”समानता बताई गई है
रूपक“तुम्हरे चरन कमल…”उपमेय में उपमान का आरोप
मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

1. “अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है?
(क) नाम उच्चारण की कठिनाई
(ख) नाम रटकर याद करना
(ग) आराध्य का नाम जपना
(घ) मित्रों का नाम रटना
उत्तर: (ग) आराध्य का नाम जपना।
रैदास के मन में राम-नाम की निरंतर भक्ति है।
2. “प्रभुजी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?
(क) एकाकार और समरूप
(ख) तरल और तीव्र सुगंध
(ग) आश्रय और आश्रित
(घ) द्रव और ठोस
उत्तर: (ख) तरल और तीव्र सुगंध।
चंदन की सुगंध पानी में मिलकर फैल जाती है।
3. “तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?
(क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।
(ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।
(ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्वपूर्ण है।
(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
उत्तर: (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।
4. “जो तुम तोरौ राम मैं नहि तोरौ” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?
(क) परोपकारी भक्ति भाव
(ख) आराध्य से अटूट संबंध
(ग) सांसारिक मोह
(घ) कर्मकांड पर बल
उत्तर: (ख) आराध्य से अटूट संबंध।
5. “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?
(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।
(ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं।
(ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।
(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
उत्तर: (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।
6. सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?
(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”
(ख) “जाकी जोति बरै दिन राती”
(ग) “तुम दीपक, हम बाती”
(घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”
उत्तर: (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा”।
अर्थ और भाव
(क) “प्रभुजी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”
उत्तर: रैदास कहते हैं कि भगवान बादल के समान हैं और भक्त मोर के समान। जैसे मोर बादल को देखकर प्रसन्न होता है, वैसे ही भक्त अपने आराध्य को देखकर आनंदित होता है।
(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।”
उत्तर: रैदास कहते हैं कि उन्हें तीर्थ और व्रत की चिंता नहीं है। उन्हें अपने आराध्य के चरणों पर पूरा विश्वास है।
मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—

1. “जो तुम तोरौ राम मैं नहि तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।
उत्तर: रैदास का भगवान से बहुत गहरा और अटूट संबंध है। वे संसार की किसी भी स्थिति में अपने आराध्य को छोड़ना नहीं चाहते। उनका विश्वास सच्चा और दृढ़ है।
2. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?
उत्तर: रैदास ने प्रभु के चरणों में सच्चे विश्वास और भक्ति को प्रमुख आधार माना है। मेरे विचार से भक्ति के आधार प्रेम, विश्वास, सेवा, सद्भाव और अच्छे कर्म हो सकते हैं।
3. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।
उत्तर: चंदन-पानी, बादल-मोर, दीपक-बाती, मोती-धागा और स्वामी-दास के प्रतीकों से भक्त और आराध्य का संबंध बताया गया है।
कविता का सौंदर्य
“प्रभुजी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”

उपर्युक्त पंक्ति में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया गया है। इसमें व्यंजन वर्णों की आवृत्ति होती है।

“प्रभुजी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।”

इस पंक्ति में उपमा अलंकार है। भक्त और आराध्य की तुलना मोती और धागे से की गई है।

“तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसा।”

इस पंक्ति में रूपक अलंकार है। प्रभु के चरणों को कमल कहा गया है।

अब आप अपनी पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविताओं में अनुप्रास, उपमा और रूपक अलंकार वाली अन्य पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर लिखिए:
कविता की कुछ अन्य विशेषताएँ

नीचे दी गई सूची को ध्यान से देखिए। इस सूची में रैदास के दोनों पदों से कुछ विशेषताएँ चुनकर दी गई हैं। पदों में से चुनकर इन विशेषताओं को दर्शाती पंक्तियाँ लिखिए।

विशेषताएँउदाहरण / पंक्ति
अनन्य भक्ति भाव“जो तुम तोरौ राम मैं नहि तोरौ, तुम सौं तोरि कवन सौं जोरौ।”
सरल और लोकधर्मी भाषा
“प्रभुजी तुम दीपक, हम बाती…”
उपमा और तुलना
“प्रभुजी तुम मोती, हम धागा…”
लयात्मकता और गेयता/ध्वन्यात्मकता
“प्रभुजी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।”
दृढ़ निष्ठा और आस्था
“तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”
अन्य विषयों से संबंध
1. तीर्थ और व्रत के स्थान पर रैदास ने आराध्य की भक्ति को प्रधान माना है। भक्तिकाल के कवि रैदास की तरह कबीर भी निराकार आराध्य की भक्ति पर बल देते हैं। तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक परिस्थितियों के आधार पर बताइए कि इसके क्या कारण हो सकते हैं? (संकेत– आप अपने सामाजिक विज्ञान के शिक्षक की सहायता भी ले सकते हैं।)
उत्तर: उस समय समाज में अनेक रूढ़ियाँ, जातिगत भेदभाव और धार्मिक आडंबर प्रचलित थे। संत कवियों ने बाहरी कर्मकांड की जगह सरल, समानतापूर्ण और मन से की जाने वाली भक्ति पर जोर दिया।
2. “सोने मिलत सुहागा” ‘सुहागा’ एक प्राकृतिक खनिज है जिसके प्रयोग से सोने की अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं और उसकी चमक बढ़ जाती है। ‘सुहागा’ का रासायनिक नाम और उसकी विशेषताएँ अपने विज्ञान के शिक्षक से चर्चा करके लिखिए।
उत्तर: सुहागा का रासायनिक नाम बोरेक्स (Sodium tetraborate) है। यह एक खनिज पदार्थ है और धातुओं को गलाने तथा शुद्ध करने की प्रक्रियाओं में फ्लक्स के रूप में उपयोग होता है।
व्याकरण की बात — शब्दों की बात
1. पठित पदों में से संज्ञा और सर्वनाम के तीन-तीन उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।
उत्तर:
संज्ञा — राम, प्रभुजी, चंदन
सर्वनाम — तुम, हम, मैं
2. रैदास के इन दोनों पदों में बहुत से ऐसे शब्द प्रयुक्त हुए हैं जिनके स्थान पर अन्य शब्दों का प्रयोग होता है। नीचे सूची में दिए गए शब्दों को देखिए। आप या आपके आस-पास के लोग इन शब्दों के लिए किन अन्य शब्दों का प्रयोग करते हैं? लिखिए।
शब्दअन्य प्रचलित शब्द
मोरामोर
चकोराचकोर
बातीबत्ती
रातीरात
सोनेसोना
तीरथतीर्थ
बरतव्रत
गतिविधियाँ
1. कक्षा में समूह बनाकर इन दोनों पदों को गाकर/पाठ करके प्रस्तुत कीजिए।
गतिविधि: समूह बनाकर दोनों पदों का भावपूर्ण पाठ या गायन कीजिए।
2. कल्पना कीजिए कि पद में आई उपमाओं के आधार पर भक्त और आराध्य आपस में बात कर रहे हैं। इस दृश्य को आधार बनाकर संवाद-लेखन कीजिए।
संकेत उत्तर:
भक्त: प्रभु! आप मेरे लिए चंदन जैसे हैं।
आराध्य: और तुम मेरे लिए पानी के समान हो, जो मेरी सुगंध फैलाता है।
भक्त: हमारा संबंध दीपक और बाती जैसा अटूट है।
आराध्य: तुम्हारी भक्ति से यह संबंध और मजबूत होता है।
3. “जो तुम तोरौ राम मैं नहि तोरौ” पंक्ति को आधार बनाकर अटूट मित्रता पर एक लघुकथा तैयार कीजिए।
संकेत उत्तर: दो मित्र कठिन समय में भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते। एक मित्र संकट में फँस जाता है, दूसरा बिना किसी स्वार्थ के उसकी सहायता करता है। इस प्रकार उनकी मित्रता और विश्वास और मजबूत हो जाता है।
नामदेव के पद — पाठ और तुलना

रैदास की तरह महाराष्ट्र के संत कवि नामदेव ने भी बाहरी आडंबरों और सामाजिक रूढ़ियों का विरोध किया तथा सामाजिक समरसता, प्रेम और निराकार भक्ति पर बल दिया।

माइ न होती बाप न होता करम न होती काया। हम नहि होते, तुम नहि होते, कवन कहां ते आया॥ राम कोइ न किसही के रा। जैसे तरवर पंखि-बसेरा॥ चंदन होता, सर न होता, पानी पवन मिलाया। सास्त्र न होता बेद न होता, करम कहां ते आया॥ खेचरि भचरि तुलसी माला गुरपरसादी पाया। नामा प्रणवै परम तत्त कूं सतगुरु मोहि लखाया॥
मोहि लागति तालाबेली। बछरा बिन गाइ अकेली॥ पानी बिन ज्यूँ मीन त्यूँ लफैं। ऐसे रामनाम बिन नामा कुलपै॥ जैसे गाइ का बाछा छूटला। थन चोखता माखन घटूला॥ नामदेउ नारायन पाया। गुरु भेटत ही अलख लखाया॥ जैसे विषै हेत परनारी। ऐसे नामे प्रीति मुरारी॥ जैसे ताप ते निरमल घामा। तैसे रामनाम बिन बापु रो नामा॥
अब अपनी कक्षा में चर्चा कीजिए और बताइए कि रैदास तथा नामदेव के पदों में क्या-क्या अंतर हैं और क्या-क्या समानताएँ हैं?
उत्तर:
समानताएँ: दोनों संत कवि सच्ची भक्ति, ईश्वर-प्रेम और बाहरी आडंबरों से दूर रहने का संदेश देते हैं।
अंतर: रैदास भक्त और आराध्य के अटूट संबंध को प्रतीकों द्वारा अधिक स्पष्ट करते हैं, जबकि नामदेव अपने पदों में ईश्वर-नाम की आवश्यकता और उससे अपने गहरे लगाव को अलग-अलग उदाहरणों से बताते हैं।
शब्द-संपदा
शब्दअर्थ
चंदनएक प्रसिद्ध वृक्ष जिसकी लकड़ी सुगंधित होती है
बासगंध, निवास, वासस्थान, वस्त्र
घनबादल, मेघ; अंधकार; समूह
चितवत / चितवन / चितवनाकिसी की ओर देखने का ढंग, दृष्टि, देखना
चकोरा / चकोरएक पक्षी जिसे चंद्रमा का प्रेमी माना जाता है
जोति / ज्योतिप्रकाश, रोशनी, लौ
तीरथ / तीर्थपुण्य क्षेत्र या धार्मिक पुण्य स्थान
अंदेसासोच, चिंता, शक, आशंका, खतरा, हानि या दुविधा
अतिरिक्त अध्ययन

रैदास के जीवन और पदों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए।

त्वरित पुनरावृत्ति
प्रश्नयाद रखने योग्य उत्तर
रैदास किस भाव के कवि हैं?अनन्य भक्ति और पूर्ण समर्पण
भक्त और आराध्य का संबंधअटूट और गहरा
तीर्थ-व्रत के स्थान पर महत्वसच्ची भक्ति और विश्वास
मुख्य भाषासरल, लोकधर्मी ब्रजभाषा
प्रमुख अलंकारअनुप्रास, उपमा और रूपक
मुख्य संदेशप्रेम, समानता, विश्वास और सच्ची भक्ति