घर की याद
कक्षा 9 हिंदी
कवि — भवानीप्रसाद मिश्र
अध्याय-सार
‘घर की याद’ भवानीप्रसाद मिश्र की अत्यंत भावपूर्ण कविता है। कवि ने यह कविता सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय जेल में रहते हुए लिखी थी। जेल में बंद कवि को लगातार बरसते सावन के पानी को देखकर अपने घर और परिवार की बहुत याद आती है।
कवि अपने माता-पिता, भाइयों, बहनों और परिवार के अन्य सदस्यों को याद करता है। उसे अपने पिता की साहसपूर्ण तथा संवेदनशील छवि, माँ के प्रेम और दृढ़ता तथा भाई-बहनों का स्नेह याद आता है। वह कल्पना करता है कि घर पर उसके माता-पिता उसकी चिंता कर रहे होंगे।
कवि सावन के बादलों को अपना संदेशवाहक बनाकर परिवार को सांत्वना देने का आग्रह करता है। वह चाहता है कि बादल उसके परिवार को यह न बताएँ कि वह जेल में दुखी है। वह अपने माता-पिता को आश्वस्त करना चाहता है कि वह ठीक है।
कविता में घर की याद, परिवार का प्रेम, वियोग, अकेलापन, त्याग, संघर्ष और प्रकृति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। लगातार गिरता पानी कवि की बेचैनी और भावुकता को और गहरा करता है।
त्वरित नोट्स
कवि परिचय
- भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद में हुआ।
- वे कवि होने के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे।
- सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल हुई।
- जेल में रहते हुए उन्होंने ‘घर की याद’ लिखी।
- उनका प्रमुख कविता-संग्रह ‘बुनी हुई रस्सी’ है, जिस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
- सन् 1985 में उनका निधन हुआ।
मुख्य भाव
- घर की याद: जेल में रहते हुए कवि को अपने घर की बहुत याद आती है।
- परिवार का स्नेह: माता-पिता, भाई-बहन कवि की स्मृतियों में जीवित हैं।
- वियोग: घर से दूर होने के कारण कवि को गहरा दुख होता है।
- प्रकृति: वर्षा, बादल, हवा और पेड़ कवि की भावनाओं को व्यक्त करते हैं।
- त्याग: कवि अपने दुख को परिवार से छिपाकर उन्हें सांत्वना देना चाहता है।
पूरी कविता — घर की याद
बहुत पानी गिर रहा है,
रात-भर गिरता रहा है,
प्राण मन घिरता रहा है,
अब सबेरा हो गया है,
कब सबेरा हो गया है,
ठीक से मैंने न जाना,
बहुत सोकर सिर्फ माना—
क्योंकि बादल की अँधेरी,
है अभी तक भी घनेरी,
अभी तक चुपचाप है सब,
रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा-झर,
हिल रहे पत्ते हरा-हर,
बह रही है हवा सर-सर,
काँपते हैं प्राण थर-थर,
बहुत पानी गिर रहा है,
घर नजर में तिर रहा है।
घर खुशी का पूर है जो,
घर कि घर में चार भाई,
मायके में बहिन आई,
बहिन आई बाप के घर,
हाय रे परिताप के घर!
घर की याद
क्योंकि इसका छिन नहीं है,
एक छिन सौ बरस है रे,
हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े हैं,
सब कि इतने कब जुड़े हैं,
चार भाई चार बहिनें
भुजा भाई प्यार बहिनें,
और माँ बिन-पढ़ी मेरी,
दुख में वह गढ़ी मेरी,
माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा
का यहाँ तक भी पसारा,
उसे लिखना नहीं आता,
जो कि उसका पत्र पाता।
घर चतुर्दिक घिर रहा है,
पिताजी भोले बहादुर,
वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
जो अभी भी दौड़ जाएँ,
जो अभी भी खिलखिलाएँ,
मौत के आगे न हिचकें,
शेर के आगे न बिचकें,
बोल में बादल गरजता,
काम में झंझा लरजता,
आज गीता-पाठ करके,
दंड दो सौ साठ करके,
खूब मुगदर हिला लेकर,
मठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे,
नैन जल से छाए होंगे।
घर नजर में तिर रहा है,
चार भाई चार बहिनें,
भुजा भाई प्यार बहिनें,
खेलते या खड़े होंगे,
नजर उनको पड़े होंगे।
पिताजी जिनको बुढ़ापा,
एक क्षण भी नहीं व्यापा,
रो पड़े होंगे बराबर,
पाँचवें का नाम लेकर,
पाँचवाँ मैं हूँ अभागा,
जिसे सोने पर सुहागा,
पिताजी कहते रहे हैं,
प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे,
लगे होंगे उन्हें हेठे,
क्योंकि मैं उन पर सुहागा
बँधा बैठा हूँ अभागा।
दुख कितना बहा होगा
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है
यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता,
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे।
हाय, कितना सहा होगा,
कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ,
धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
गिर रहा है आज पानी,
याद आता है भवानी,
उसे थी बरसात प्यारी,
रात दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह,
घूमता फिरता मगन वह,
बड़े बाड़े में कि जाता,
बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला
ने फलानी फूल झेला,
तू कि उसके साथ जाती,
आज इससे याद आती,
मैं न रोऊँगा—कहा होगा,
और फिर पानी बहा होगा।
पाँचवें की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल,
और अम्मा ठीक बादल,
और भौजी और सरला,
सहज पानी सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ,
खूब भीतर छटपटाएँ,
आज ऐसा कुछ हुआ होगा
आज सबका मन चुआ होगा।
मन निहायत नम गया है,
एक-से बादल जमे हैं,
गगन-भर फैले रमे हैं,
ढेर है उनका, न फाँकें,
जो कि किरणें झुके-झाँकें,
लग रहे हैं वे मुझे यों,
माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;
गगन-आँगन की लुनाई
दश-दिशा के मन में समाई
दश-दिशा चुपचाप है रे,
स्वस्थ की लय छाप है रे।
साँस स्थिर मंद करके,
हिले बिन चुपके खड़े हैं,
क्षितिज पर जैसे जड़े हैं
एक पंछी बोलता है,
घाव उर के खोलता है,
आदमी के उर बिचारे,
किसलिए इतनी तृषा रे,
तृषा जरा-सा दुख कितना,
सह सकेगा क्या कि इतना,
और इस पर बस नहीं है,
बस बिना कुछ रस नहीं है।
लहर आई मुड़ चला तू,
लगा झटका टूट बैठा,
गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर,
बह चला रे पर होकर,
दुख भर क्या पास तेरे,
अश्रु सिंचित हास तेरे!
दे रहा है क्लेश मुझको,
देह एक पहाड़ जैसे,
मन कि बड़ का झाड़ जैसे,
एक पत्ता टूट जाए,
बस कि धारा फूट जाए,
एक हल्की चोट लग ले,
दूध की नदी उमग ले,
एक टहनी कम न हो ले,
कम कहाँ कि ख़म न हो ले,
ध्यान कितना फिक्र कितनी,
डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का ख्याल उनका,
हवा, उनको धीर देना,
यह नहीं जी चीर देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है,
घर नहीं हूँ बस यही है,
किंतु यह बस बड़ा बस है,
इसी बस से सब विरस है।
उन्हें देते धीर रहना,
उन्हें कहना लिख रहा हूँ,
उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना,
नाम करता हूँ कि कहना,
चाहते हैं लोग, कहना
मत करो कुछ शोक, कहना,
और कहना मस्त हूँ मैं,
कातने में व्यस्त हूँ मैं,
वजन सत्तर सेर मेरा,
और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ,
दुख डटकर ठेलता हूँ,
और कहना मस्त हूँ मैं,
यों न कहना अस्त हूँ मैं,
हाय रे, ऐसा न कहना,
है कि जो वैसा न कहना,
कह न देना जागता हूँ,
आदमी से भागता हूँ।
खुद न समझूँ कौन हूँ मैं,
देखना कुछ बक न देना,
उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन,
हे कि मेरे पुण्य पावन,
तुम बरस लो वे न बरसें,
पाँचवें को वे न तरसें।
कविता के मुख्य बिंदु
| बिंदु | संक्षिप्त जानकारी |
|---|---|
| कविता का स्थान | जेल |
| समय | सन् 1942 का स्वतंत्रता आंदोलन |
| मुख्य संवेदना | घर और परिवार की याद |
| प्रकृति का माध्यम | सावन, बादल, वर्षा, हवा, पेड़ |
| परिवार | माँ, पिताजी, चार भाई, चार बहिनें तथा अन्य परिजन |
| कवि की इच्छा | बादल परिवार को कवि के ठीक होने का संदेश दें |
| मुख्य संदेश | परिवार का प्रेम दूरी और कठिन परिस्थितियों में भी मन को जोड़कर रखता है। |
शब्द-संपदा
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| घनेरा / घना | बहुत गाढ़ा |
| तिरना / तरना | तैरना, उतराना |
| परिताप | अत्यधिक दुख, शोक |
| चतुर्दिक | चारों ओर |
| वज्र | बहुत कठोर |
| नवनीत | ताजा मक्खन |
| उर | हृदय |
| झंझा | तेज हवा या आँधी |
| लरजना | काँपना, दहलना |
| मूठ | मुट्ठी-भर वस्तु या मुट्ठी |
| अभागा | भाग्यहीन |
| धीर | दृढ़ और गंभीर |
| झारी | पानी रखने का टोंटीदार बर्तन |
| बेला | एक सुगंधित फूल |
| फलानी / फलाना | कोई व्यक्ति या वस्तु |
| निहायत | बहुत अधिक |
| लुनाई | सुंदरता, सलोनापन |
| क्षितिज | जहाँ धरती और आकाश मिले दिखाई देते हैं |
| तृषा | तीव्र इच्छा, प्यास |
| अश्रु | आँसू |
| हास | हँसी, प्रसन्नता |
| क्लेश | दुख, पीड़ा |
| बड़ | बरगद का पेड़ |
| उमग | उल्लास, जोश |
| ख़म | झुका हुआ, टेढ़ापन |
| विरस | नीरस, अप्रिय |
| कातना | रुई या ऊन से धागा बनाना |
| अस्त | डूबा हुआ, समाप्त |
अभ्यास — मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयक्ुत क््योों लगते हैैं?
कवि 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन के समय जेल में थे और वहीं उन्हें घर-परिवार की याद आई।
बारिश कवि के भीतर उठती घर की याद और बेचैनी को और गहरा करती है।
माँ कवि को प्रेम करती है, लेकिन साथ ही उसे देश के लिए किए गए त्याग पर दृढ़ रहने की प्रेरणा देती है।
पिता बाहर से मजबूत और साहसी हैं, लेकिन भीतर से बहुत कोमल और भावुक हैं।
पिता इतने संवेदनशील हैं कि छोटी-सी चोट भी उनके भीतर भावनाओं की धारा बहा सकती है।
कवि से दूर होने के कारण परिवार के घर में उसकी याद और दुख का वातावरण है।
कवि नहीं चाहता कि उसके परिवार को जेल के कष्टों की चिंता हो।
पूरी कविता का केंद्र घर और परिवार से दूर रहने की पीड़ा है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
कोख को मेरी लजाता,
इस तरह होओ न कच्चे,
रो पड़ेंगे और बच्चे।”
इन पंक्तियों में माँ कवि को कमजोर न पड़ने की प्रेरणा देती है। वह दुखी होते हुए भी उसके देशहित के निर्णय का समर्थन करती है।
कविता का सौंदर्य
बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर”
उपर्युक्त पंक्तियों में ध्वनि को व्यक्त करने वाले शब्द कविता को सुनने और पढ़ने में प्रभावशाली बनाते हैं। “झरा-झर”, “हरा-हर”, “सर-सर” और “थर-थर” से वर्षा, पत्तों, हवा और कवि की कंपकंपी का अनुभव होता है।
कविता की विशेषताएँ
| विशेषता | कविता से उदाहरण |
|---|---|
| स्मृति और दृश्य बिंब | “घर नजर में तिर रहा है” — घर कवि की आँखों और स्मृति में दिखाई देता है। |
| लोकभाषा की सहजता | “एक छिन सौ बरस है रे”, “हाय कैसा तरस है रे” |
| पंक्तियों का दोहराव | “बहुत पानी गिर रहा है”, “घर नजर में तिर रहा है” |
| आलंकारिक प्रयोग | “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” — उपमा का प्रयोग। |
| प्राकृतिक दृश्यों और भावों का संयोजन | वर्षा और बादलों के साथ कवि की घर की याद और बेचैनी जुड़ी है। |
| संबोधनात्मकता | “हे सजीले हरे सावन” |
कविता की संरचना
‘घर की याद’ कवि के भीतर उठते भावों की यात्रा है। वर्षा से शुरू होकर यह यात्रा घर की स्मृतियों, माता-पिता और भाई-बहनों की याद, उनके संभावित दुख और अंत में परिवार को सांत्वना देने की कवि की इच्छा तक पहुँचती है।
कविता की संरचना — प्रश्न और उत्तर
रचनात्मक गतिविधियाँ
तुम्हारी बहुत याद आती है। तुम वहाँ अपना ध्यान रखना। तुम्हारे पिता और भाई-बहन तुम्हें बहुत याद करते हैं। हमें तुम्हारे देश के लिए किए गए त्याग पर गर्व है। दुखी मत होना और हिम्मत बनाए रखना। हमें विश्वास है कि तुम ठीक हो।
तुम्हारी माँ
पिताजी: हाँ, वह साहसी है। वह कठिनाइयों से नहीं डरता।
माँ: फिर भी मन तो उसके लिए चिंतित रहता है।
पिताजी: हमें उसके साहस पर गर्व होना चाहिए।
माँ: सही कहते हैं। उसे अपने उद्देश्य से पीछे नहीं हटना चाहिए।
पिताजी: हाँ, वह देश के लिए गया है। हमें उसे हिम्मत देनी चाहिए।
व्याकरण की बात
1. स्थानीय भाषा के शब्द
उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द कवि की क्षेत्रीय/स्थानीय भाषा का शब्द है। कविता में स्थानीय भाषा के शब्दों का सहज प्रयोग हुआ है। कविता से कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। उनमें रेखांकित शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए।
| पंक्ति | शब्द का अर्थ | नया वाक्य |
|---|---|---|
| एक छिन सौ बरस है रे | छिन = क्षण | एक छिन में सब कुछ बदल गया। |
| तुझे बतलाता कि बेला/ने फलानी फूल झेला | फलानी = किसी विशेष/नाम न बताई गई वस्तु या व्यक्ति | फलानी लड़की आज विद्यालय नहीं आई। |
| और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला | भौजी = भाभी; सहज = स्वाभाविक/सरल | भौजी ने मुझे प्यार से बुलाया। |
| मन कि बड़ का झाड़ जैसे | बड़ = बरगद का पेड़ | बरगद का बड़ पेड़ बहुत विशाल था। |
2. व्याकरणिक पहचान
- ‘पानी’ शब्द है — संज्ञा
- ‘बहुत’ शब्द है — विशेषण
- ‘गिर रहा है’ है — क्रिया
- ‘बुढ़ापा’ शब्द है — संज्ञा
- ‘व्यापा’ शब्द है — क्रिया
- ‘जिनको’ शब्द है — सर्वनाम
- ‘खुले’ शब्द है — विशेषण
- ‘वह’ शब्द है — सर्वनाम
- ‘बदन’ शब्द है — संज्ञा
- ‘फिरता’ शब्द है — क्रिया
- ‘एक’ शब्द है — विशेषण
- ‘फूट जाए’ है — क्रिया
- ‘पत्ता’ शब्द है — संज्ञा
- ‘सजीले’ शब्द है — विशेषण
- ‘मेरे’ शब्द है — सर्वनाम
- ‘सावन’ शब्द है — संज्ञा
गतिविधि — मेरा परिवार-वृक्ष
दादा-दादी/नाना-नानी → माता-पिता → भाई-बहन → मैं
परिवार का प्रत्येक सदस्य अलग गुण रखता है। कोई मेहनती है, कोई स्नेही, कोई जिम्मेदार और कोई हँसमुख। परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे का सहयोग करते हैं।
भाषा संगम
नीचे ‘घर’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
| भाषा | ‘घर’ के लिए शब्द |
|---|---|
| हिंदी | मकान, गृह, निवास |
| संस्कृत | गृहम् |
| पंजाबी | घर |
| उर्दू | घर |
| कश्मीरी | गॅर |
| सिंधी | घरु |
| मराठी | घर |
| गुजराती | घर |
| कोंकणी | घर |
| नेपाली | घर, आवास |
| बांग्ला | घर, बाड़ी |
| असमिया | घर |
| मणिपुरी | यमु |
| ओड़िआ | घर, गृह, आलय, आबास |
| तेलुगु | इल्लु |
| तमिल | वीडु, इल्लम |
| मलयालम | वीडु, इल्लम |
| कन्नड़ | गृह, मने |
उदाहरण: “घर” को अंग्रेज़ी में House या Home कहते हैं।
वाक्य: “घर में सब जुड़े हैं।”
मेरी मातृभाषा: __________
मेरी मातृभाषा में वाक्य: ______________________________
अतिरिक्त कविता — मुख्य भाव
नीचे दी गई अतिरिक्त कविता में सुबह, चिड़ियों का गीत, ठंडी हवा, चमकते तारे और चाँद के माध्यम से ईश्वर की याद व्यक्त की गई है। कवि प्रकृति के सुंदर रूपों को देखकर सृष्टि के रचयिता को याद करता है।
कलियाँ दरवाजे खोल-खोल, जब दुनिया पर मुसकाती हैं।।
जब ठंडी-ठंडी हवा कहीं से, मस्ती ढोकर लाती है।
हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है।।
चुपचाप चमकते तारों की, महफिल जब रात सजाती है।
जब चाँद शान से उठता है, दिल की दुनिया जग जाती है।।
कुछ पता नहीं, लेकिन जरूर, वह संदेशा कुछ पाती है।
हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है!!
कवि — रामनरेश त्रिपाठी
परीक्षा के लिए त्वरित पुनरावृत्ति
- ‘घर की याद’ के कवि — भवानीप्रसाद मिश्र
- कविता की केंद्रीय संवेदना — घर और परिवार की याद
- कविता लिखने का समय — 1942 का स्वतंत्रता आंदोलन
- कविता लिखने का स्थान — जेल
- मुख्य प्राकृतिक तत्व — वर्षा, बादल, हवा, पेड़
- बादल को कवि ने — संदेशवाहक बनाया है।
- माँ — स्नेहमयी और दृढ़
- पिताजी — साहसी, मजबूत और भावुक
- “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” — पिता के बाहरी बल और अंदर की कोमलता का संकेत।
- “दुख डटकर ठेलता हूँ” — कठिनाइयों से संघर्ष करने का भाव।
- “एक छिन सौ बरस है रे” — वियोग में समय बहुत लंबा लगना।
- “घर नजर में तिर रहा है” — स्मृति में घर का जीवंत हो उठना।
- “और कहना मस्त हूँ मैं” — कवि अपने दुख को परिवार से छिपाना चाहता है।
एक पंक्ति में अध्याय
‘घर की याद’ परिवार के प्रति गहरे प्रेम, घर से दूर रहने की पीड़ा और कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य तथा त्याग बनाए रखने की मार्मिक कविता है।