विश्वेश्वरैया
कक्षा 7 हिन्दी मल्हार | अध्याय 4 — पानी रे पानी | पढ़ने के लिए
आकाश में अँधेरा छाया हुआ था। बादल आकाश में मँडराते हुए एक-दूसरे से टकरा जाते तो बिजली चमक उठती और गर्जन होता। फिर मूसलाधार वर्षा होने लगी। कुछ ही देर में गड्ढे और नालियाँ पानी से भर गईं।
छः वर्षीय विश्वेश्वरैया अपने घर के बरामदे में खड़ा इस दृश्य को निहार रहा था। गली में पंक्तियों में खड़े पेड़ बारिश में धुल जाने के कारण साफ व सुंदर दिखाई दे रहे थे। पत्तियों और टहनियों से पानी की बूँदें टप-टप गिर रही थीं। थोड़ी ही दूरी पर हरे-भरे धान के खेत लहलहा रहे थे।
जहाँ विश्वेश्वरैया खड़ा था वहीं निकट की नाली का पानी उमड़-घुमड़ रहा था। उसमें भँवर भी उठ रहे थे। उसने एक जलप्रपात का रूप धारण कर लिया था। वह एक बहुत ही बड़े पत्थर को अपने साथ बहा कर ले जा रहा था जिससे उसकी शक्ति का प्रदर्शन होता था। विश्वेश्वरैया ने हवा और सूर्य की शक्ति को भी देखा था। सामूहिक रूप से वे प्रकृति की असीम शक्ति की ओर संकेत कर रहे थे। ‘प्रकृति शक्ति है। मुझे प्रकृति के बारे में सब कुछ जानना चाहिए’ वह छोटा-सा लड़का बुदबुदाया।
फिर उसने थोड़ी दूरी पर, निर्भीकता से मूसलाधार वर्षा में खड़ी एक आकृति को ताड़पत्र की छतरी हाथ में लिए देखा। वह उसे तुरंत पहचान गया। उसके कपड़े फटे हुए थे। वह कमजोर और भूखी लग रही थी। वह एक झोंपड़ी में रहती थी। उसके बच्चे कभी स्कूल नहीं जाते। वह गरीब थी। विश्वेश्वरैया ने सोचा ‘वह इतनी गरीब क्यों है?’
उन्होंने बड़ी गंभीरता से प्रकृति और गरीबी के कारण के बारे में जानने का प्रयास किया। वह परिवार के बड़ों से इन बातों का उत्तर जानना चाहते थे। वह अपने अध्यापकों से भी जिरह करते। वह उनसे प्रकृति के बारे में पूछते— ऊर्जा के कौन से प्रचलित स्रोत हैं? कैसे इस ऊर्जा को पकड़ कर इस्तेमाल में लाया जा सकता है?
वह यह भी पूछते कि आखिर इतने लोग गरीब क्यों हैं? नौकरानी फटी साड़ी क्यों पहनती है? वह झोपड़ी में क्यों रहती है? क्या उसे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहिए?
धीरे-धीरे इस लड़के को प्रकृति और जीवन के बारे में अंतर्दृष्टि प्राप्त होने लगी। उन्हें महसूस हुआ कि ज्ञान असीमित है। उसे बिना रुके, सीखते रहना होगा। तभी उन्हें उन प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं जो उन्होंने उठाए थे। उन्होंने निश्चय किया कि वह जीवनपर्यंत तक छात्र बने रहेंगे क्योंकि बहुत कुछ सीखना बाकी है। इसी संकल्प में उनकी महानता की कुंजी थी।
मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (जो अब कर्नाटक में है) के मुद्देनाहल्ली नामक स्थान पर 15 सितंबर 1861 को हुआ था। उनके पिता वैद्य थे। वर्ष पहले उनके पूर्वज आंध्र प्रदेश के मोक्षगुंडम से यहाँ आए और मैसूर में बस गए थे।
दो वर्ष की आयु से ही उनका परिचय रामायण, महाभारत और पंचतंत्र की कहानियों से हो गया था। ये कहानियाँ हर रात घर की वृद्ध महिलाएँ उन्हें सुनाती थीं। कहानियाँ शिक्षाप्रद व मनोरंजक थीं। इन कहानियों से विश्वेश्वरैया ने ईमानदारी, दया और अनुशासन जैसे मूल मानवीय मूल्यों को आत्मसात किया।
विश्वेश्वरैया चिकबल्लापुर के मिडिल व हाईस्कूल में पढ़े। जब उन्हें ‘गॉड सेव द किंग’ (ईश्वर राजा को सुरक्षित रखे) वाला गीत गाने को कहा गया तो उन्हें पता चला कि भारत एक ब्रिटिश उपनिवेश है, अपने मामलों में भी भारतीयों को कुछ कहने का अधिकार न था। भारत की अधिकांश संपत्ति विदेशियों ने हड़प ली थी।
क्या उनके घर में काम करने वाली नौकरानी विदेशी शासन के कारण गरीब है? यह प्रश्न विश्वेश्वरैया के मस्तिष्क में उमड़ता-घुमड़ता रहा। राष्ट्रीयता की चिंगारी जल उठी थी और उनके जीवन में यह अंत तक जलती रही।
विश्वेश्वरैया जब केवल चौदह वर्ष के थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। क्या वह अपनी पढ़ाई जारी रखें? इस प्रश्न पर तब विचार-विमर्श हुआ जब उन्होंने अपनी माँ से कहा,
“अम्मा, क्या मैं बंगलौर जा सकता हूँ? मैं वहाँ मामा रामैया के यहाँ रह सकता हूँ। वहाँ मैं कॉलेज में प्रवेश ले लूँगा।”
पर बेटा… तुम्हारे मामा अमीर नहीं हैं। तुम उन पर बोझ क्यों बनना चाहते हो?” उनकी माँ ने तर्क किया।
“अम्मा… मैं अपनी जरूरतों के लिए स्वयं कमाऊँगा। मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दूँगा। अपनी फीस देने और पुस्तकें खरीदने के लिए मैं काफी धन कमा लूँगा। मेरे ख्याल से मेरे पास कुछ पैसे बच भी जाएँगे, जिन्हें मैं मामा को दे दूँगा,” विश्वेश्वरैया ने समझाया।
उनके पास हर प्रश्न का उत्तर था— समाधान ढूँढ़ने की क्षमता उनके पूरे जीवन में लगातार विकसित होती रही और इस कारण वह एक व्यावहारिक व्यक्ति बन गए। यह उनके जीवन का सार था और उनका संदेश था पहले जानो, फिर करो। बड़े होकर यही विश्वेश्वरैया एक महान इंजीनियर बने।
— आर. के. मूर्ति
(अनुवाद — सुमन जैन)
पाठ का परिचय
“विश्वेश्वरैया” कक्षा 7 हिन्दी मल्हार के अध्याय 4 “पानी रे पानी” के “पढ़ने के लिए” भाग में दिया गया जीवन-प्रसंग है। इसमें बालक विश्वेश्वरैया की जिज्ञासा, सीखने की इच्छा, स्वावलंबन और समस्याओं के समाधान खोजने की प्रवृत्ति को दिखाया गया है।
विश्वेश्वरैया का संक्षिप्त जीवन परिचय
| बिंदु | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया |
| जन्म | 15 सितंबर 1861 |
| जन्म स्थान | मुद्देनाहल्ली, मैसूर क्षेत्र |
| पिता | वैद्य |
| मुख्य गुण | जिज्ञासा, परिश्रम, स्वावलंबन, अनुशासन और समस्या-समाधान की क्षमता |
| व्यवसाय | महान इंजीनियर |
| जीवन संदेश | पहले जानो, फिर करो। |
सरल सारांश
छः वर्ष के विश्वेश्वरैया एक दिन तेज वर्षा को ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने वर्षा के कारण बहते पानी, नाली में उठते भँवर, बड़े पत्थर को बहाकर ले जाते पानी तथा हवा और सूर्य की शक्ति को देखा।
इन प्राकृतिक घटनाओं को देखकर उनके मन में प्रकृति के बारे में जानने की जिज्ञासा पैदा हुई। वे सोचने लगे कि प्रकृति की शक्ति को कैसे समझा और उपयोग में लाया जा सकता है।
उसी समय उन्होंने एक गरीब महिला को वर्षा में खड़े देखा। उसके फटे कपड़े, गरीबी और बच्चों का स्कूल न जाना देखकर उनके मन में अनेक प्रश्न उठे। वे जानना चाहते थे कि लोग गरीब क्यों होते हैं और गरीबी का कारण क्या है।
विश्वेश्वरैया बचपन से ही प्रश्न पूछने और उनके उत्तर खोजने में रुचि रखते थे। वे अपने परिवार के बड़ों और अध्यापकों से भी प्रश्न करते थे।
धीरे-धीरे उन्हें समझ आया कि ज्ञान असीमित है और मनुष्य को जीवनभर सीखते रहना चाहिए। उन्होंने जीवनभर विद्यार्थी बने रहने का निश्चय किया।
चौदह वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी माँ को बताया कि वे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च स्वयं निकालेंगे।
उनके जीवन में समस्याओं का समाधान खोजने की क्षमता लगातार विकसित हुई। बड़े होकर वे महान इंजीनियर बने। उनके जीवन का महत्वपूर्ण संदेश था: “पहले जानो, फिर करो।”
अनुच्छेदवार सरल व्याख्या
1. वर्षा का दृश्य
तेज वर्षा हो रही थी। आकाश में बादल थे, बिजली चमक रही थी और बादलों की गर्जना सुनाई दे रही थी। गड्ढे और नालियाँ पानी से भर गई थीं।
2. प्रकृति को ध्यान से देखना
छः वर्षीय विश्वेश्वरैया वर्षा के दृश्य को ध्यान से देख रहे थे। पेड़ धुलकर साफ दिखाई दे रहे थे और धान के खेत हरे-भरे दिखाई दे रहे थे।
3. पानी की शक्ति
नाली का पानी बहुत तेज गति से बह रहा था। उसमें भँवर उठ रहे थे और वह जलप्रपात जैसा दिखाई दे रहा था। पानी एक बड़े पत्थर को भी बहाकर ले जा रहा था। इससे बालक ने पानी की शक्ति को समझा।
4. प्रकृति के प्रति जिज्ञासा
विश्वेश्वरैया ने हवा और सूर्य की शक्ति को भी देखा। इससे उनके मन में प्रकृति के बारे में अधिक जानने की इच्छा उत्पन्न हुई।
5. गरीबी के प्रति संवेदनशीलता
उन्होंने एक गरीब महिला को देखा जिसके कपड़े फटे हुए थे और जो झोंपड़ी में रहती थी। उसके बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। इस दृश्य से उनके मन में गरीबी के कारणों को जानने की जिज्ञासा हुई।
6. प्रश्न पूछने की आदत
वे परिवार के बड़ों और अध्यापकों से प्रश्न करते थे। वे प्रकृति की शक्ति, ऊर्जा के स्रोत और गरीबी जैसे विषयों के बारे में जानना चाहते थे।
7. जीवनभर सीखने का संकल्प
उन्हें समझ आया कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। इसलिए उन्होंने जीवनभर सीखते रहने का निश्चय किया।
8. कठिन परिस्थिति में शिक्षा जारी रखना
पिता की मृत्यु के बाद भी उन्होंने पढ़ाई छोड़ने का विचार नहीं किया। उन्होंने स्वयं कमाकर अपनी फीस और पुस्तकों का खर्च निकालने का निश्चय किया।
9. महान इंजीनियर
समस्या का समाधान खोजने की उनकी क्षमता जीवनभर विकसित होती रही। इसी कारण वे व्यावहारिक व्यक्ति बने और आगे चलकर महान इंजीनियर बने।
कठिन शब्द एवं अर्थ
| शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| मँडराना | किसी स्थान के आसपास घूमना |
| गर्जन | बादलों के तेज आवाज करने की क्रिया |
| मूसलाधार | बहुत तेज और लगातार होने वाली वर्षा |
| निहारना | ध्यान से देखना |
| भँवर | घूमता हुआ पानी |
| जलप्रपात | ऊँचाई से गिरता हुआ पानी |
| असीम | जिसकी कोई सीमा न हो |
| निर्भीकता | बिना डर के |
| ताड़पत्र | ताड़ के पत्ते से बनी वस्तु |
| अंतर्दृष्टि | गहरी समझ |
| असीमित | जिसकी सीमा न हो |
| संकल्प | दृढ़ निश्चय |
| आत्मसात | अपने जीवन में ग्रहण करना |
| उपनिवेश | दूसरे देश के शासन के अधीन देश |
| राष्ट्रीयता | राष्ट्र के प्रति प्रेम और निष्ठा |
| स्वावलंबन | अपने काम और आवश्यकताओं के लिए स्वयं पर निर्भर रहना |
| व्यावहारिक | व्यवहार और वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार काम करने वाला |
| जिरह करना | प्रश्न करके जानकारी प्राप्त करना |
महत्वपूर्ण बिंदु
- विश्वेश्वरैया बचपन से बहुत जिज्ञासु थे।
- वे प्रकृति की घटनाओं को ध्यान से देखते थे।
- वे हर बात के पीछे का कारण जानना चाहते थे।
- उन्हें गरीब लोगों की स्थिति की चिंता थी।
- वे अपने अध्यापकों से अनेक प्रश्न करते थे।
- उन्होंने जीवनभर सीखते रहने का संकल्प लिया।
- उन्होंने कठिन परिस्थिति में भी पढ़ाई जारी रखने का निश्चय किया।
- वे अपनी पढ़ाई का खर्च स्वयं उठाना चाहते थे।
- समस्या का समाधान खोजने की क्षमता उनके व्यक्तित्व की विशेषता थी।
- बड़े होकर वे महान इंजीनियर बने।
पाठ का संदेश
इस पाठ से हमें सीख मिलती है कि हमें हर चीज को केवल देखकर छोड़ नहीं देना चाहिए। उसके बारे में प्रश्न पूछना और कारण समझना चाहिए।
हमें कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं माननी चाहिए। लगातार सीखते रहना, मेहनत करना और समस्याओं के समाधान खोजते रहना सफलता की ओर ले जाता है।
मुख्य संदेश — “पहले जानो, फिर करो।”
कार्यपत्रिका — Worksheet with Answers
नाम: ______________________________
कक्षा: __________ दिनांक: __________
भाग A — बहुविकल्पीय प्रश्न
(a) खेत में
(b) विद्यालय में
(c) घर के बरामदे में
(d) सड़क पर
(a) सूखे
(b) साफ और सुंदर
(c) टूटे हुए
(d) पीले
(a) नदी
(b) तालाब
(c) जलप्रपात
(d) समुद्र
(a) केवल पानी की शक्ति
(b) हवा, सूर्य और पानी की शक्ति
(c) केवल सूर्य की शक्ति
(d) केवल हवा की शक्ति
(a) लोग इतने अमीर क्यों हैं
(b) लोग इतने गरीब क्यों हैं
(c) वर्षा कब समाप्त होगी
(d) खेत कितने बड़े हैं
(a) शिक्षक
(b) इंजीनियर
(c) छात्र
(d) किसान
(a) शिक्षक
(b) वैद्य
(c) किसान
(d) इंजीनियर
(a) खेती करके
(b) व्यापार करके
(c) बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर
(d) नौकरी करके
(a) पहले करो, फिर जानो
(b) पहले जानो, फिर करो
(c) हमेशा आराम करो
(d) प्रश्न मत पूछो
भाग B — रिक्त स्थान भरिए
भाग C — सही या गलत
भाग D — मिलान कीजिए
| कॉलम A | कॉलम B |
|---|---|
| 1. विश्वेश्वरैया | क. बच्चों को पढ़ाना |
| 2. नाली का पानी | ख. वैद्य |
| 3. विश्वेश्वरैया के पिता | ग. महान इंजीनियर |
| 4. ट्यूशन | घ. जलप्रपात जैसा |
| 5. जीवन संदेश | ङ. पहले जानो, फिर करो |
1 — ग
2 — घ
3 — ख
4 — क
5 — ङ
भाग E — लघु उत्तरीय प्रश्न
भाग F — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
भाग G — सोचिए और लिखिए
भाग H — मूल्य आधारित प्रश्न
त्वरित पुनरावृत्ति
| बिंदु | उत्तर |
|---|---|
| पाठ | विश्वेश्वरैया |
| अध्याय | पानी रे पानी |
| मुख्य पात्र | मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया |
| बचपन का गुण | जिज्ञासा |
| प्रकृति के प्रति भावना | जानने और समझने की इच्छा |
| गरीबी के प्रति भावना | संवेदनशीलता और कारण जानने की इच्छा |
| मुख्य संकल्प | जीवनभर सीखते रहना |
| कठिन परिस्थिति में उपाय | ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकालना |
| मुख्य संदेश | पहले जानो, फिर करो |
| बड़े होकर | महान इंजीनियर बने |
स्वयं जाँचिए
| मैं कर सकता/सकती हूँ | हाँ / अभ्यास चाहिए |
|---|---|
| मैं विश्वेश्वरैया का परिचय दे सकता/सकती हूँ। | ____________ |
| मैं पाठ का सार बता सकता/सकती हूँ। | ____________ |
| मैं कठिन शब्दों के अर्थ बता सकता/सकती हूँ। | ____________ |
| मैं विश्वेश्वरैया के गुण बता सकता/सकती हूँ। | ____________ |
| मैं “पहले जानो, फिर करो” का अर्थ समझा सकता/सकती हूँ। | ____________ |
| मैं प्रश्नों के उत्तर अपने शब्दों में लिख सकता/सकती हूँ। | ____________ |