Class 6 Hindi Chapter 6 – मेरी माँ | Notes & Book Solutions

Class 6 Hindi Chapter 6 मेरी माँ के आसान Notes और Book Solutions पढ़ें। अध्याय की सरल व्याख्या, महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर और पुस्तक के अभ्यास प्रश्नों के आसान समाधान एक ही जगह।

कक्षा 6 हिंदी मल्हार पाठ 6 मेरी माँ | Study CBSE

मेरी माँ

कक्षा 6 हिंदी मल्हार | पाठ 6

सरल, रंगीन और बच्चों के लिए उपयोगी पाठ-नोट्स

📚 पाठ का सारांश

‘मेरी माँ’ रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा का एक भावपूर्ण अंश है। इसमें बिस्मिल ने अपनी माँ के प्रेम, त्याग, साहस, शिक्षा, अच्छे संस्कार और प्रोत्साहन का वर्णन किया है।

बिस्मिल की माँ ने कठिन परिस्थितियों में भी उनका साथ दिया। जब वे देश-सेवा और सेवा-समिति के कार्यों में भाग लेना चाहते थे, तब उनकी माँ ने उनका उत्साह बढ़ाया। इसके कारण उन्हें परिवार के विरोध और डाँट का सामना भी करना पड़ा। उन्होंने बिस्मिल को सत्य बोलने, साहसी बनने और अपने संकल्प पर दृढ़ रहने की सीख दी।

बिस्मिल की माँ ने स्वयं विवाह के बाद शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने घर के काम-काज के साथ-साथ पढ़ना-लिखना सीखा और अपनी बेटियों को भी शिक्षा दी। वे मानती थीं कि किसी के प्राण नहीं लेने चाहिए, यहाँ तक कि शत्रु के भी नहीं।

लेखक अपनी माँ को अपनी सफलता, शिक्षा, धार्मिक विचारों और देश-सेवा का मुख्य आधार मानते हैं। वे अपनी माँ के प्रति गहरा आभार व्यक्त करते हैं। उन्हें दुख है कि वे अपनी माँ की जीवनभर सेवा नहीं कर पाएँगे। वे आशा करते हैं कि उनकी माँ को उन पर गर्व होगा और वे भारत माता की सेवा में अपना जीवन समर्पित करके उनकी कोख को कलंकित नहीं करेंगे।

🌟 पाठ की मुख्य सीख

  • माता-पिता के प्रेम और त्याग का सम्मान करना चाहिए।
  • हमें कठिन परिस्थितियों में भी अपने अच्छे संकल्प पर दृढ़ रहना चाहिए।
  • शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
  • सत्य का पालन करना चाहिए।
  • देश-सेवा और समाज-सेवा के लिए प्रेरित रहना चाहिए।
  • किसी भी व्यक्ति के प्राण लेने से बचना चाहिए।
  • माँ के संस्कार बच्चे के जीवन को सही दिशा देते हैं।

🖼️ पाठ से संबंधित चित्र

रामप्रसाद बिस्मिल का चित्र

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ — स्वतंत्रता सेनानी, कवि और लेखक

📖 पाठ का विस्तृत पाठ

“श्री रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ बड़े होनहार नौजवान थे। गज़ब के शायर थे। देखने में भी बहुत सुंदर थे। योग्य बहुत थे। जाननेवाले कहते हैं कि यदि किसी और जगह या किसी और देश या किसी और समय पैदा हुए होते तो सेनाध्यक्ष बनते।” यह कहना है हमारे देश के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह का बिस्मिल के बारे में।

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ का जन्म जब हुआ, उस समय भारत पर अंग्रेज़ों का आधिपत्य था। ‘बिस्मिल’ छोटी-सी आयु से ही भारत की स्वतंत्रता के लिए अंग्रेज़ों से लड़ते रहे। अंग्रेज़ों ने उन्हें जेल भेज दिया और फ़ाँसी की सज़ा दे दी। जेल में भी उन्होंने अंग्रेज़ों के अनेक अत्याचार सहे।

जेल में रहते-रहते ही उन्होंने चोरी-छिपे अपनी आत्मकथा लिखी और अंग्रेज़ों से बचते-बचाते जेल से बाहर भेजते रहे। उनके साथियों ने उसे प्रकाशित भी करवा दिया। इसका नाम रखा गया—‘निज जीवन की एक छटा’। इस पुस्तक ने अंग्रेज़ों के होश उड़ा दिए। लोगों में अंग्रेज़ों के विरुद्ध क्रोध और बढ़ गया। इस तरह इस आत्मकथा के कारण अंग्रेज़ बिस्मिल को फ़ाँसी देने के बाद भी उन्हें हरा न सके।

इस आत्मकथा के माध्यम से आज भी ‘बिस्मिल’ हमारे मस्तिष्क में जीवित हैं। आज भी यह आत्मकथा लोगों को प्रेरित करती है। क्या आप भी उनकी आत्मकथा को पढ़ना चाहते हैं? क्या कहा? हाँ? तो यहाँ प्रस्तुत है उसी आत्मकथा का एक अंश।

लखनऊ कांग्रेस में जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी। दादीजी और पिताजी तो विरोध करते रहे, किंतु माताजी ने मुझे खर्च दे ही दिया। उसी समय शाहजहाँपुर में सेवा-समिति का आरंभ हुआ था। मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देता था। पिताजी और दादीजी को मेरे इस प्रकार के कार्य अच्छे न लगते थे, किंतु माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं, जिसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डाँट-फटकार तथा दंड सहन करना पड़ता था।

वास्तव में, मेरी माताजी देवी हैं। मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है। दादीजी और पिताजी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किंतु माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा।

माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने मेरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा।

एक समय मेरे पिताजी दीवानी मुकदमे में किसी पर दावा करके वकील से कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे पर कर दूँ।

मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्मविरुद्ध होगा, इस प्रकार का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत समझाया कि मुकदमा खारिज हो जाएगा। किंतु मुझ पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए। अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।

ग्यारह वर्ष की उम्र में माताजी विवाह कर शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय वह नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान थीं। शाहजहाँपुर आने के थोड़े दिनों बाद दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को गृहकार्य की शिक्षा दी।

थोड़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं। मेरे जन्म होने के पाँच या सात वर्ष बाद उन्होंने हिंदी पढ़ना आरंभ किया। पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ था।

मुहल्ले की सखी-सहेली जो घर पर आया करती थीं, उन्हीं में जो शिक्षित थीं, माताजी उनसे अक्षर-बोध करतीं। इस प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम के फल से थोड़े दिनों में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं।

मेरी बहनों को छोटी आयु में माताजी ही शिक्षा दिया करती थीं। जब से मैंने आर्यसमाज में प्रवेश किया, माताजी से खूब वार्तालाप होता। उस समय की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गए हैं।

यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की है, जैसी मेजिनी को उनकी माता ने की थी।

माताजी का सबसे बड़ा आदर्श मेरे लिए यही था कि किसी की प्राणहानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न देना। उनके इस आदर्श की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी थी।

जन्मदात्री जननी! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण उतारने का प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या, यदि मैं अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयत्न करूँ तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता।

जिस प्रेम तथा दृढ़ता के साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुमने जिस प्रकार अपनी देववाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है।

तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका। धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैंने ग्रहण की उसका भी श्रेय तुम्हीं को है।

जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश करती थीं, उसका स्मरण कर तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और मस्तक झुक जाता है। तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्नेह से हर बात को समझा दिया।

यदि मैंने धृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुमने प्रेम भरे शब्दों में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो, किंतु ऐसा करना ठीक नहीं, इसका परिणाम अच्छा न होगा।

जीवनदात्री! तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन-पोषण ही नहीं किया, बल्कि आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं। जन्म-जन्मांतर परमात्मा ऐसी ही माता दें।

महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया। सदैव अपनी प्रेमभरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सांत्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया।

इस संसार में मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक इच्छा है, वह यह कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु की दुखभरी खबर सुनाई जाएगी।

माँ! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझकर धैर्य धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता या भारत माता की सेवा में अपने जीवन को बलि-वेदी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कोख कलंकित न की, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा।

जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा।

गुरु गोबिंद सिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु की खबर सुनी तो बहुत प्रसन्न हुई थीं और गुरु के नाम पर धर्म-रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर मिठाई बाँटी थी।

जन्मदात्री! वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हारे चरण-कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूँ।

— रामप्रसाद ‘बिस्मिल’

👨‍🏫 लेखक से परिचय

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक क्रांतिकारी वीरों ने अपना बलिदान दिया। ‘सरफरोशी की तमन्ना’ जैसा तराना लिखने वाले रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ भी उन्हीं क्रांतिकारियों में से एक थे। मात्र तीस वर्ष की आयु में अंग्रेज़ सरकार द्वारा उन्हें फ़ाँसी पर लटका दिया गया।

असाधारण प्रतिभा के धनी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ एक अच्छे कवि और लेखक भी थे। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमें उनकी आत्मकथा काफ़ी चर्चित रही। ‘मेरी माँ’ उनकी आत्मकथा का ही एक अंश है।

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’
जन्म: 1897
मृत्यु: 1927

📖 पाठ से — मेरी समझ से

(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा () बनाइए—

(1) ‘किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती।’
बिस्मिल को अपनी किस इच्छा के पूर्ण न होने की आशंका थी?

☐ भारत माता के साथ रहने की
☐ अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने की
★ अपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की
☐ भोग विलास तथा ऐश्वर्य भोगने की
सही उत्तर: अपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की।
कारण: बिस्मिल को दुख था कि वे अपनी माँ की सेवा करके उनका ऋण नहीं चुका पाएँगे।

(2) रामप्रसाद बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदर्श क्या था?

☐ देश की सेवा करें
★ कभी किसी के प्राण न लेना
☐ कभी किसी से छल न करना
☐ सदा सच बोलना
सही उत्तर: कभी किसी के प्राण न लेना।
कारण: बिस्मिल की माँ चाहती थीं कि किसी की प्राणहानि न हो, यहाँ तक कि शत्रु की भी नहीं।

(ख) अब अपने मित्रों के साथ तर्कपूर्ण चर्चा कीजिए कि आपने ये ही उत्तर क्यों चुने?

उत्तर: पहले प्रश्न में बिस्मिल अपनी माँ की जीवनभर सेवा करना चाहते थे, लेकिन उन्हें ऐसा अवसर न मिलने का दुख था। दूसरे प्रश्न में उनकी माँ का आदर्श किसी के प्राण न लेना था। इसलिए यही उत्तर सही हैं।

💬 पंक्तियों पर चर्चा

पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें पढ़कर समझिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? कक्षा में अपने विचार साझा कीजिए और लिखिए।

(क) “यदि मुझ ऐसी माता न मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता।”

सरल अर्थ: बिस्मिल मानते थे कि उनकी माँ के अच्छे संस्कार और प्रोत्साहन के बिना वे साधारण जीवन जीते रहते। उनकी माँ ने उन्हें महान कार्यों के लिए प्रेरित किया।

(ख) “उनके इस आदर्श की पूर्ति करने के लिए मुझे मज़बूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।”

सरल अर्थ: बिस्मिल की माँ चाहती थीं कि किसी की जान न जाए। इस आदर्श को पूरा करने के लिए बिस्मिल को कभी-कभी अपनी प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ी।

🤝 मिलकर करें मिलान

पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सही अर्थ या संदर्भों से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट, पुस्तकालय या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।

शब्दअर्थ या संदर्भ
1. देवनागरी4. भारत की एक भाषा-लिपि जिसमें हिंदी, संस्कृत, मराठी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं।
2. आर्यसमाज3. महर्षि दयानंद द्वारा स्थापित एक संस्था।
3. मेजिनी2. इटली के गुप्त राष्ट्रवादी दल का सेनापति; इटली का मसीहा था जिसने लोगों को एक सूत्र में बाँधा।
4. गोबिंद सिंह1. सिखों के दसवें और अंतिम गुरु। उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।
सही मिलान:
1 → 4
2 → 3
3 → 2
4 → 1

🤔 सोच-विचार के लिए

1. बिस्मिल की माता जी जब ब्याह कर आईं तो उनकी आयु काफ़ी कम थी।

(क) फिर भी उन्होंने स्वयं को अपने परिवार के अनुकूल कैसे ढाला?

उत्तर: उन्होंने घर के काम-काज सीखे और थोड़े ही समय में भोजन तथा घर की व्यवस्था अच्छी तरह सँभालने लगीं।

(ख) उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति के बल पर स्वयं को कैसे शिक्षित किया?

उत्तर: उन्होंने घर के काम पूरे करने के बाद बचे हुए समय में शिक्षित सखियों से अक्षर-बोध किया और धीरे-धीरे देवनागरी की पुस्तकें पढ़ना सीख लिया।

2. बिस्मिल को साहसी बनाने में उनकी माता जी ने कैसे सहयोग दिया?

उत्तर: माता जी ने उनका उत्साह बढ़ाया, कठिन समय में उनका साथ दिया और उन्हें अपने संकल्प पर दृढ़ रहने की प्रेरणा दी।

3. आज से कई दशक पहले बिस्मिल की माँ शिक्षा के महत्त्व को समझती थीं, बताइए कैसे?

उत्तर: उन्होंने स्वयं विवाह के बाद पढ़ना-लिखना सीखा और अपनी बेटियों को भी शिक्षा दी। वे बिस्मिल को भी पहले शिक्षा प्राप्त करने की सलाह देती थीं।

4. हम कैसे कह सकते हैं कि बिस्मिल की माँ स्वतंत्र और उदार विचारों वाली थीं?

उत्तर: उन्होंने स्वयं शिक्षा प्राप्त की, बिस्मिल को देश-सेवा के लिए प्रोत्साहित किया और किसी के भी प्राण न लेने का आदर्श अपनाया।

✍️ आत्मकथा की रचना

यह पाठ रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा का एक अंश है। आत्मकथा यानी अपनी कथा। दुनिया में अनेक लोग अपनी आत्मकथा लिखते हैं, कभी अपने लिए तो कभी दूसरों के पढ़ने के लिए।

(क) इस पाठ को एक बार फिर से पढ़िए और अपने-अपने समूह में मिलकर इस पाठ की ऐसी पंक्तियों की सूची बनाइए जिनसे पता लगे कि लेखक अपने बारे में कह रहा है।

उत्तर के उदाहरण:
  • मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है।
  • मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समिति में सहयोग देता था।
  • मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्मविरुद्ध होगा।
  • अपने जीवन में हमेशा सत्य का आचरण करता था।
  • जब से मैंने आर्यसमाज में प्रवेश किया, माताजी से खूब वार्तालाप होता।
  • तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका।

(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।

गतिविधि: अपने समूह द्वारा चुनी गई पंक्तियों को कक्षा में पढ़कर सुनाइए और बताइए कि इनमें लेखक अपने जीवन के बारे में क्या कह रहा है।

🔤 शब्द-प्रयोग तरह-तरह के

(क) “माता जी उनसे अक्षर-बोध करतीं।”

इस वाक्य में अक्षर-बोध का अर्थ है— अक्षर का बोध या ज्ञान।

एक अन्य वाक्य देखिए— “जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं।” इस वाक्य में पढ़ना-लिखना अर्थात पढ़ना और लिखना।

हम लेखन में शब्दों को मिलाकर छोटा बना लेते हैं, जिससे समय, स्याही और कागज़ आदि की बचत होती है। संक्षेपीकरण मानव का स्वभाव भी है।

पाठ से ऐसे शब्द खोजिए और सूची बनाइए।

मिले-जुले शब्दविस्तृत रूप
अक्षर-बोधअक्षर का बोध या ज्ञान
पढ़ना-लिखनापढ़ना और लिखना
भोजनादिभोजन आदि
शिक्षादिशिक्षा आदि
पालन-पोषणपालन और पोषण
आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिकआत्मा, धर्म और समाज से संबंधित

🌼 पाठ से आगे — आपकी बात

(क) रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के मित्रों के नाम खोजिए और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भागीदारी पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

उत्तर के उदाहरण: रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के क्रांतिकारी साथियों में अशफाक़ उल्ला ख़ाँ, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी और रोशन सिंह के नाम प्रमुख हैं। इन क्रांतिकारियों ने भारत की स्वतंत्रता के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।

(ख) नीचे लिखे बिंदुओं को आधार बनाते हुए अपनी माँ या अपने अभिभावक से बातचीत कीजिए और उनके बारे में गहराई से जानिए कि उनका प्रिय रंग, भोज्य पदार्थ, गीत, बचपन की यादें, प्रिय स्थान आदि कौन-कौन से थे?

उदाहरण के लिए—

  • आपका जन्म कहाँ हुआ था?
  • आपकी प्रिय पुस्तक का नाम क्या है?
  • आपका प्रिय रंग कौन-सा है?
  • आपका प्रिय भोजन क्या है?
  • आपके बचपन की सबसे अच्छी याद कौन-सी है?
  • आपको कौन-सा गीत पसंद है?
  • आपका प्रिय स्थान कौन-सा है?
गतिविधि: अपने माता या अभिभावक से बातचीत करके उत्तर अपनी कॉपी में लिखिए।

📚 पुस्तकालय या इंटरनेट से

आप पुस्तकालय से रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा खोजकर पढ़िए। देशभक्तों से संबंधित अन्य पुस्तकें, जैसे उनकी आत्मकथा, जीवनी, पत्र आदि पढ़िए और अपने मित्रों से साझा कीजिए।

पुस्तकालय गतिविधि: रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ के जीवन पर आधारित किसी एक पुस्तक का नाम लिखिए और उससे मिली तीन महत्वपूर्ण बातें अपनी कॉपी में लिखिए।

🗣️ शब्दों की बात

आप अपनी माँ को क्या कहकर संबोधित करते हैं? अन्य भाषाओं में माँ के लिए प्रयुक्त संबोधन और माँ के लिए शब्द ढूँढ़िए। क्या उनमें कुछ समानता दिखती है? हाँ, तो क्या?

भाषामाँ के लिए शब्द
हिंदीमाँ, माता, अम्मा
संस्कृतमाता, जननी
अंग्रेज़ीMother, Mom
बंगालीमा
मराठीआई
गुजरातीબા, મા
पंजाबीਮਾਂ
तमिलஅம்மா
तेलुगुఅమ్మ
उत्तर: अनेक भाषाओं में माँ के लिए बोले जाने वाले शब्दों में ‘म’, ‘मा’ या ‘अम्मा’ जैसी ध्वनियाँ मिलती हैं। इससे शब्दों में समानता दिखाई देती है।

🧩 आज की पहेली

यहाँ दी गई वर्गपहेली में पाठ से बारह विशेषण दिए गए हैं। उन्हें छाँटकर पाठ में रेखांकित कीजिए।

मंगलमय
ीलप्रत्येकनो
छोटीधाग्यारहू
खूबर्मिसाधार
णड़ाकदख
ुभरीपमहा
नस्वाधीनप्रे
पाठ से मिलने वाले विशेषणों के उदाहरण:
होनहार प्रसिद्ध सुंदर योग्य छोटी बड़ा नितांत अशिक्षित ग्रामीण मनोहर मंगलमयी महान

🪷 झरोखे से — ऐ मातृभूमि!

ऐ मातृभूमि! तेरी जय हो, सदा विजय हो।
प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कांतिमय हो।

अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में;
संसार के हृदय में, तेरी प्रभा उदय हो।

तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो।
तेरी प्रसन्नता ही आनंद का विषय हो।

वह भक्ति दे कि ‘बिस्मिल’ सुख में तुझको न भूले,
वह शक्ति दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो।

— रामप्रसाद ‘बिस्मिल’

सरल भावार्थ: कवि मातृभूमि की विजय और समृद्धि की कामना करते हैं। वे ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि भारत में सुख, शांति और प्रकाश फैले। कवि चाहते हैं कि वे सुख में भी देश को न भूलें और दुख के समय भी उनका हृदय कमजोर न पड़े।

🔎 खोजबीन के लिए

माँ से संबंधित पाँच रचनाएँ पुस्तकालय से खोजें और अपनी पत्रिका बनाएँ।

पत्रिका बनाने के सुझाव:
  • पत्रिका का सुंदर नाम रखिए।
  • माँ पर पाँच कविताएँ या छोटी रचनाएँ एकत्र कीजिए।
  • हर रचना के लेखक का नाम लिखिए।
  • माँ से संबंधित चित्र बनाइए या चिपकाइए।
  • अंत में माँ के प्रति अपनी भावनाएँ लिखिए।

🧠 त्वरित पुनरावृत्ति

  • ‘मेरी माँ’ रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा का एक अंश है।
  • बिस्मिल की माँ ने उन्हें शिक्षा, साहस और देश-सेवा के लिए प्रेरित किया।
  • माँ ने स्वयं भी विवाह के बाद पढ़ना-लिखना सीखा।
  • बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदर्श था कि किसी की प्राणहानि न हो।
  • बिस्मिल अपनी माँ को अपने जीवन की प्रेरणा मानते थे।
  • बिस्मिल सत्य का पालन करते थे और गलत हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था।
  • ‘ऐ मातृभूमि!’ कविता में देश-प्रेम और मातृभूमि के प्रति भक्ति व्यक्त की गई है।

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