Class 6 Hindi मल्हार Chapter 4 हार की जीत – आसान नोट्स, सारांश, शब्दार्थ, NCERT पुस्तक के प्रश्न-उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न और worksheet। कहानी को सरल भाषा में समझें और परीक्षा की तैयारी करें।
हार की जीत
कक्षा 6 हिंदी – मल्हार
अध्याय 4 | सरल एवं बच्चों के लिए आसान Notes & Solutions
🌟 अध्याय का सारांश
“हार की जीत” प्रसिद्ध लेखक सुदर्शन की प्रेरक कहानी है। इस कहानी के मुख्य पात्र बाबा भारती, डाकू खड्गसिंह और उनका प्रिय घोड़ा सुलतान हैं।
बाबा भारती को अपने घोड़े सुलतान से बहुत प्रेम था। वे उसकी देखभाल करते और रोज़ उस पर सवारी करते थे। खड्गसिंह नाम का एक प्रसिद्ध डाकू सुलतान को देखकर उसे पाने की इच्छा करने लगा।
एक दिन खड्गसिंह ने अपाहिज का रूप बनाकर बाबा भारती से सहायता माँगी। बाबा भारती ने दया करके उसे घोड़े पर बैठा लिया। अवसर पाकर खड्गसिंह ने घोड़ा छीन लिया।
बाबा भारती ने घोड़ा वापस माँगने के बजाय केवल यह प्रार्थना की कि खड्गसिंह इस घटना को किसी के सामने न बताए। उन्होंने कहा कि यदि लोगों को इस घटना का पता चला तो वे गरीबों पर विश्वास करना छोड़ देंगे।
बाबा भारती की इस महान सोच ने खड्गसिंह के मन को बदल दिया। उसके अंदर पश्चाताप जागा और वह रात में सुलतान को वापस बाबा भारती के अस्तबल में बाँध गया।
📖 पूरी कहानी – हार की जीत

घोड़े का चित्र – Wikimedia Commons
माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवत भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान।
उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाके में न था। बाबा भारती उसे सुलतान कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, खुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे।
उन्होंने रुपया, माल, असबाब, ज़मीन आदि अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, यहाँ तक कि उन्हें नगर के जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे।
“मैं सुलतान के बिना नहीं रह सकूँगा”, उन्हें ऐसी भ्रांति-सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, “ऐसे चलता है जैसे मोर घटा को देखकर नाच रहा हो।” जब तक संध्या समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।
खड्गसिंह उस इलाके का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा।
एक दिन वह दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया। बाबा भारती ने पूछा, “खड्गसिंह, क्या हाल है?”
खड्गसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”
“कहो, इधर कैसे आ गए?”
“सुलतान की चाह खींच लाई।”
“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”
“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”
“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”
“कहते हैं देखने में भी बहुत सुंदर है।”
“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”
“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”
बाबा भारती और खड्गसिंह दोनों अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुजरा था।
सोचने लगा, ‘भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ?’
कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात उसके हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”
बाबा भारती भी मनुष्य ही थे। अपनी चीज़ की प्रशंसा दूसरे के मुँह से सुनने के लिए उनका हृदय भी अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर लाए और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। एकाएक उचककर सवार हो गए, घोड़ा हवा से बातें करने लगा।
उसकी चाल को देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर वह अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था, आदमी थे और बेरहमी थी।
जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”
बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड्गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ असावधान हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाईं मिथ्या समझने लगे।
संध्या का समय था। बाबा भारती सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को और मन में फूले न समाते थे।
सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”
आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”
अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामावाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”
“वहाँ तुम्हारा कौन है?”
“दुर्गादत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”
बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे। सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई।
उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड्गसिंह था।
बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”
खड्गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”
“परंतु एक बात सुनते जाओ।”
खड्गसिंह ठहर गया।
बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा कसाई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड्गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ, इसे अस्वीकार न करना; नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”
“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूँगा।”
“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”
खड्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसे लगा था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।
इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड्गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?”
सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे किसी गरीब पर विश्वास न करेंगे। दुनिया से विश्वास उठ जाएगा।”
यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही न रहा हो।
बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, ‘कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है!’
उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाईं खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे।
परंतु आज उनके मुख पर दुख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह खयाल था कि कहीं लोग गरीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें।
रात के अँधेरे में खड्गसिंह बाबा भारती के मंदिर में पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था।
खड्गसिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक खुला पड़ा था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था।
खड्गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।
रात्रि का तीसरा पहर बीत चुका था। चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर बढ़े।
परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँव को मन-मन-भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए।
घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया। अब बाबा भारती आश्चर्य और प्रसन्नता से दौड़ते हुए अंदर गए और अपने घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे मानो कोई पिता बहुत दिन से बिछड़े पुत्र से मिल रहा हो।
बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते। और कहते थे, “अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।”
थोड़ी देर के बाद जब वह अस्तबल से बाहर निकले तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। ये आँसू उसी भूमि पर ठीक उसी जगह गिर रहे थे, जहाँ बाहर निकलने के बाद खड्गसिंह खड़ा होकर रोया था।
दोनों के आँसुओं का उस भूमि की मिट्टी पर परस्पर मेल हो गया।
📘 पाठ से – मेरी समझ से
आइए, अब हम ‘हार की जीत’ कहानी को थोड़ा और निकटता से समझ लेते हैं।
(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा () बनाइए—
(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
✍️ लेखक से परिचय
यह कहानी हिंदी की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है और इसे हिंदी के प्रसिद्ध लेखक सुदर्शन ने लिखा है। सुदर्शन का वास्तविक नाम बदरीनाथ भट्ट था।
उन्होंने पहली कहानी तब लिखी थी जब ये आप ही की तरह छठी कक्षा में पढ़ते थे। सुदर्शन ने कहानियों के अतिरिक्त कविताएँ, लेख, नाटक और उपन्यास भी लिखे। इसके अलावा उन्होंने अनेक फ़िल्मों की पटकथा और गीत भी लिखे।
वास्तविक नाम: बदरीनाथ भट्ट
जन्म: 1896
निधन: 1983
🏷️ शीर्षक
(क) आपने अभी जो कहानी पढ़ी है, इसका नाम सुदर्शन ने ‘हार की जीत’ रखा है। अपने समूह में चर्चा करके लिखिए कि उन्होंने इस कहानी को यह नाम क्यों दिया होगा? अपने उत्तर का कारण भी लिखिए।
(ख) यदि आपको इस कहानी को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा, यह भी बताइए।
(ग) बाबा भारती ने डाकू खड्गसिंह से कौन-सा वचन लिया?
💬 पंक्तियों पर चर्चा
कहानी में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार लिखिए—
🤔 सोच-विचार के लिए
कहानी को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित पंक्ति के विषय में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
(क) किस-किस के आँसुओं का मेल हो गया था?
(ख) दोनों के आँसुओं में क्या अंतर था?
⏰ दिनचर्या
(क) कहानी पढ़कर आप बाबा भारती के जीवन के विषय में बहुत कुछ जान चुके हैं। अब आप कहानी के आधार पर बाबा भारती की दिनचर्या लिखिए। वे सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक क्या-क्या करते होंगे, लिखिए। इस काम में आप थोड़ा-बहुत अपनी कल्पना का सहारा भी ले सकते हैं।
(ख) अब आप अपनी दिनचर्या भी लिखिए।
📝 कहानी की रचना
(क) इस कहानी की कौन-कौन सी बातें आपको पसंद आई? आपस में चर्चा कीजिए।
(ख) कोई भी कहानी पाठक को तभी पसंद आती है जब उसे अच्छी तरह लिखा गया हो। लेखक कहानी को अच्छी तरह लिखने के लिए अनेक बातों का ध्यान रखते हैं, जैसे— शब्द, वाक्य, संवाद आदि। इस कहानी में आए संवादों के विषय में अपने विचार लिखें।
🌈 मुहावरे कहानी से
(क) कहानी से चुनकर कुछ मुहावरे नीचे दिए गए हैं— लट्टू होना, हृदय पर साँप लोटना, फूले न समाना, मुँह मोड़ लेना, मुख खिल जाना, न्योछावर कर देना। कहानी में इन्हें खोजकर इनका प्रयोग समझिए।
| मुहावरा | सरल अर्थ |
|---|---|
| लट्टू होना | बहुत अधिक मोहित होना |
| हृदय पर साँप लोटना | बहुत ईर्ष्या होना |
| फूले न समाना | बहुत खुश होना |
| मुँह मोड़ लेना | संबंध या ध्यान हटाना |
| मुख खिल जाना | बहुत प्रसन्न होना |
| न्योछावर कर देना | पूरी तरह समर्पित कर देना |
(ख) अब इनका प्रयोग करते हुए अपने मन से नए वाक्य बनाइए।
👥 कैसे-कैसे पात्र
इस कहानी में तीन मुख्य पात्र हैं— बाबा भारती, डाकू खड्गसिंह और सुलतान घोड़ा। इनके गुणों को बताने वाले शब्दों से दिए गए शब्द-चित्रों को पूरा कीजिए—
| पात्र | गुण / विशेषताएँ |
|---|---|
| बाबा भारती | दयालु, धार्मिक, प्रेमी, सहृदय, विश्वास करने वाले |
| डाकू खड्गसिंह | बाहुबली, कठोर, लालची, अंत में पश्चाताप करने वाला |
| सुलतान घोड़ा | सुंदर, बलवान, तेज, आकर्षक |
दिए गए भाव
🌟 पाठ से आगे – सुलतान की कहानी
मान लीजिए, यह कहानी सुलतान सुना रहा है। तब कहानी कैसे आगे बढ़ती? स्वयं को सुलतान के स्थान पर रखकर कहानी बनाइए।
संकेत— आप कहानी को इस प्रकार बढ़ा सकते हैं — मेरा नाम सुलतान है। मैं एक घोड़ा हूँ…..
मेरा नाम सुलतान है। मैं एक घोड़ा हूँ। बाबा भारती मुझे बहुत प्यार करते थे। वे स्वयं मुझे दाना खिलाते और मेरी देखभाल करते थे। मैं भी अपने मालिक से बहुत प्रेम करता था। एक दिन खड्गसिंह मुझे छल से अपने साथ ले गया। बाबा भारती ने उसे रोकने के बजाय गरीबों की सहायता के बारे में सोचा। उनकी महान बातों से खड्गसिंह को पश्चाताप हुआ और वह मुझे वापस अस्तबल में बाँध गया। मुझे अपने मालिक के पास लौटकर बहुत खुशी हुई।
💭 मन के भाव
(क) कहानी में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। बताइए, कहानी में कौन, कब, ऐसा अनुभव कर रहा था—
| भाव | कौन अनुभव कर रहा था? | कब? |
|---|---|---|
| चकित | खड्गसिंह | जब उसने सुलतान को पहली बार देखा। |
| अधीर | खड्गसिंह | जब वह सुलतान को देखने के लिए उत्सुक था। |
| डर | बाबा भारती | जब उन्हें खड्गसिंह से घोड़ा छिनने का भय था। |
| प्रसन्नता | बाबा भारती | जब वे सुलतान के साथ रहते थे और बाद में उसे वापस पाकर। |
| करुणा | बाबा भारती | जब उन्होंने अपाहिज को देखा। |
| निराशा | बाबा भारती | जब उन्हें लगा कि सुलतान वापस नहीं आया। |
(ख) आप उपर्युक्त भावों को कब-कब अनुभव करते हैं? लिखिए।
🌬️ झरोखे से
आप जानते ही हैं कि लेखक सुदर्शन ने अनेक कविताएँ भी लिखी हैं। आइए, उनकी लिखी एक कविता पढ़ते हैं—
वह चली हवा,
वह चली हवा।
न त देखे
न मैं देखूँ
पर पत्तों ने तो देख लिया
वरना वे खुशी मनाते क्यों?
वह चली हवा,
वह चली हवा।
— सुदर्शन
🤝 साझी समझ
आपको इस कविता में क्या अच्छा लगा? आपस में चर्चा कीजिए और अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
🔎 खोजबीन के लिए
सुदर्शन की कुछ अन्य रचनाएँ पुस्तक में दिए गए क्यू.आर. कोड या इंटरनेट या पुस्तकालय की सहायता से पढ़ें, देखें व समझें।
⭐ त्वरित पुनरावृत्ति
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| कहानी के लेखक कौन हैं? | सुदर्शन |
| बाबा भारती के घोड़े का नाम क्या था? | सुलतान |
| खड्गसिंह कौन था? | एक प्रसिद्ध डाकू |
| खड्गसिंह ने घोड़ा कैसे छीना? | अपाहिज का रूप बनाकर। |
| बाबा भारती ने खड्गसिंह से क्या माँगा? | घटना किसी को न बताने का वचन। |
| खड्गसिंह का हृदय क्यों बदला? | बाबा भारती की महान सोच और दया से। |
| सुलतान को कौन वापस लाया? | खड्गसिंह |
| कहानी का मुख्य संदेश क्या है? | दया, विश्वास और अच्छे विचार मनुष्य को बदल सकते हैं। |
📚 महत्वपूर्ण शब्दार्थ
| शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| लहलहाते | हरे-भरे |
| अर्पण | समर्पित करना |
| खरहरा करना | घोड़े के शरीर को साफ करना |
| कीर्ति | यश / प्रसिद्धि |
| अभिलाषा | इच्छा |
| बाँका | सुंदर और आकर्षक |
| अधीर | उतावला / बेचैन |
| बाहुबल | शारीरिक शक्ति |
| करुणा | दया |
| पश्चाताप | गलती पर दुख होना |
| निराशा | आशा समाप्त होने का भाव |
| प्रकट | जाहिर / सामने लाना |
💡 कहानी से मिलने वाली सीख
- हमें जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करनी चाहिए।
- हमें दूसरों पर विश्वास करना सीखना चाहिए।
- अच्छे विचार किसी बुरे व्यक्ति को भी बदल सकते हैं।
- हमें अपनी गलती का पश्चाताप करके उसे सुधारना चाहिए।
- दया और मानवता सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं।
- हमें गरीब और कमजोर लोगों की सहायता से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
कक्षा 6 हिंदी मल्हार अध्याय 4 के लिए यह आसान और उपयोगी worksheet अभ्यास के लिए तैयार की गई है।इसमें पाठ से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न, शब्दार्थ और समझ पर आधारित प्रश्न शामिल हैं।
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