Class 6 Hindi मल्हार Chapter 2 गोल – आसान नोट्स, सारांश, शब्दार्थ, NCERT पुस्तक के प्रश्न-उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न और worksheet। पाठ को सरल भाषा में समझें और परीक्षा की तैयारी करें।6
गोल
कक्षा 6 हिंदी — मल्हार | अध्याय 2
मेजर ध्यानचंद के जीवन, खेल भावना, अनुशासन, मेहनत और दूसरों को अवसर देने की प्रेरक कहानी
📚 अध्याय का सारांश
‘गोल’ प्रसिद्ध भारतीय हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के संस्मरण का एक अंश है। इस पाठ में उनके हॉकी जीवन, खेल कौशल, खेल भावना, मेहनत और अच्छे व्यवहार की झलक मिलती है।
एक हॉकी मैच के दौरान एक खिलाड़ी ने गुस्से में ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मार दी। कुछ देर बाद पट्टी बाँधकर मैदान में लौटे ध्यानचंद ने उससे कहा कि वे अपना बदला जरूर लेंगे। लेकिन उन्होंने बदला किसी गलत तरीके से नहीं लिया। उन्होंने लगातार छह गोल किए और खेल समाप्त होने के बाद उसे समझाया कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं है।
इस घटना से पता चलता है कि ध्यानचंद खेल को सही भावना से खेलते थे। वे केवल स्वयं गोल करने पर ध्यान नहीं देते थे, बल्कि गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने साथी खिलाड़ी को पास करते थे ताकि उसे भी गोल करने का अवसर मिले।
ध्यानचंद का जन्म सन् 1905 में प्रयाग में हुआ। बाद में उनका परिवार झाँसी आकर बस गया। वे 16 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुए। उनकी रेजिमेंट हॉकी के लिए प्रसिद्ध थी। शुरुआत में उन्हें हॉकी में विशेष रुचि नहीं थी, लेकिन अभ्यास, लगन और साधना से वे एक महान खिलाड़ी बने।
सन् 1936 के बर्लिन ओलंपिक में वे भारतीय हॉकी टीम के कप्तान बने। उनके शानदार खेल से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहना शुरू किया। भारत ने बर्लिन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता।
मेजर ध्यानचंद = हॉकी का जादूगर + लगन + साधना + खेल भावना + साथियों को अवसर + देश के लिए खेलना।
🌟 पाठ का परिचय
इस पाठ का नाम पढ़कर आपके मन में कुछ गोल वस्तुओं के नाम या चित्र उभरे होंगे, गोल गेंद, गोल रोटी, गोल चंद्रमा आदि। लेकिन यह पाठ एक विशेष प्रकार के गोल और उसे करने वाले के बारे में है। यह पाठ एक प्रसिद्ध खिलाड़ी के संस्मरण का एक अंश है। आइए, इसे पढ़ते हैं और जानते हैं कि कौन थे वे प्रसिद्ध खिलाड़ी!

मेजर ध्यानचंद — 1936 ओलंपिक से संबंधित चित्र।
जीवनकाल: 1905–1979
प्रसिद्ध नाम: हॉकी का जादूगर
📖 पाठ का पूरा अंश
खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं। खेल में तो यह सब चलता ही था। जिन दिनों हम खेला करते थे, उन दिनों भी यह सब चलता था। सन 1933 की बात है। उन दिनों में, मैं पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था। एक दिन ‘पंजाब रेजिमेंट’ और ‘सैंपर्स एंड माइनर्स टीम’ के बीच मुकाबला हो रहा था।
‘माइनर्स टीम’ के खिलाड़ी मुझसे गेंद छीनने की कोशिश करते, लेकिन उनकी हर कोशिश बेकार जाती। इतने में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी स्टिक मेरे सिर पर दे मारी। मुझे मैदान से बाहर ले जाया गया।
थोड़ी देर बाद मैं पट्टी बाँधकर फिर मैदान में आ पहुँचा। आते ही मैंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा, “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं जरूर लूँगा।”
मेरे इतना कहते ही वह खिलाड़ी घबरा गया। अब हर समय मुझे ही देखता रहता था कि मैं कब उसके सिर पर हॉकी स्टिक मारने वाला हूँ।
मैंने एक के बाद एक झटपट छह गोल कर दिए। खेल खत्म होने के बाद मैंने फिर उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और कहा, “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।”
वह खिलाड़ी सचमुच बड़ा शर्मिंदा हुआ। तो देखा आपने मेरा बदला लेने का ढंग? सच मानो, बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।
आज मैं जहाँ भी जाता हूँ बच्चे व बूढ़े मुझे घेर लेते हैं और मुझसे मेरी सफलता का राज जानना चाहते हैं। मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं। हर किसी से यही कहता कि लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं।
मेरा जन्म सन् 1905 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ। बाद में हम झाँसी आकर बस गए। 16 साल की उम्र में मैं ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गया। मेरी रेजिमेंट का हॉकी खेल में काफी नाम था।
पर खेल में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय हमारी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी थे। वे बार-बार मुझे हॉकी खेलने के लिए कहते। हमारी छावनी में हॉकी खेलने का कोई निश्चित समय नहीं था। सैनिक जब चाह मैदान में पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर देते। उस समय तक मैं एक नौसिखिया खिलाड़ी था।
जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई। सन् 1936 में बर्लिन ओलंपिक में मुझे कप्तान बनाया गया। उस समय मैं सेना में लांस नायक था।
बर्लिन ओलंपिक में लोग मेरे हॉकी खेलने के ढंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे ‘हॉकी का जादूगर’ कहना शुरू कर दिया। इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था। मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए।
अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया। बर्लिन ओलंपिक में हमें स्वर्ण पदक मिला। खेलते समय मैं हमेशा इस बात का ध्यान रखता था कि हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।
📝 पाठ से — मेरी समझ से
(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा () बनाइए—
(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?
👤 लेखक से परिचय
मेजर ध्यानचंद (1905–1979)
मेजर ध्यानचंद भारत के प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी थे। उनका जीवन मेहनत, अनुशासन, अभ्यास और खेल भावना का उदाहरण है। लोग उनके शानदार हॉकी कौशल से प्रभावित होकर उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहते थे।
उनके जन्मदिन को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
🔗 मिलकर करें मिलान
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सही अर्थों या संदर्भों से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।
| शब्द | सही अर्थ या संदर्भ |
|---|---|
| 1. लांस नायक | 2. भारतीय सेना का एक पद (रैंक) है। |
| 2. बर्लिन ओलंपिक | 4. वर्ष 1936 में जर्मनी के बर्लिन शहर में आयोजित ओलंपिक खेल प्रतियोगिता, जिसमें 49 देशों ने भाग लिया था। |
| 3. पंजाब रेजिमेंट | 5. स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज़ों की भारतीय सेना का एक दल। |
| 4. सैंपर्स एंड माइनर्स टीम | 6. अंग्रेज़ों के समय का एक हॉकी दल। |
| 5. सूबेदार | 1. स्वतंत्रता से पहले सूबेदार भारतीय सैन्य अधिकारियों का दूसरा सबसे बड़ा पद था। |
| 6. छावनी | 3. सैनिकों के रहने का क्षेत्र। |
1 → 2 | 2 → 4 | 3 → 5 | 4 → 6 | 5 → 1 | 6 → 3
💬 पंक्तियों पर चर्चा
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार कक्षा में अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
🤔 सोच-विचार के लिए
संस्मरण को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए—
📚 संस्मरण की रचना
इस वाक्य को पढ़कर ऐसा लगता है मानो लेखक आपसे यानी पाठक से अपनी यादों को साझा कर रहा है। ध्यान देंगे तो इस पाठ में ऐसी और भी अनेक विशेष बातें आपको दिखाई देंगी।
- लेखक अपने जीवन की पुरानी घटना बताता है।
- घटनाएँ प्रथम पुरुष में कही गई हैं।
- लेखक अपनी यादों और अनुभवों को साझा करता है।
- घटनाओं के साथ संवाद भी हैं।
- भाषा सरल और रोचक है।
- पाठ से जीवन और खेल भावना की सीख मिलती है।
🔤 शब्दों के जोड़े, विभिन्न प्रकार के
(क) शब्द-युग्म
इस वाक्य में ‘जैसे-जैसे’ और ‘वैसे-वैसे’ शब्दों के जोड़े हैं जिनमें एक ही शब्द दो बार उपयोग में लाया गया है। ऐसे जोड़ों को ‘शब्द-युग्म’ कहते हैं। शब्द-युग्म में दो शब्दों के बीच में छोटी-सी रेखा लगाई जाती है जिसे योजक चिह्न कहते हैं। योजक यानी जोड़ने वाला।
- घर-घर
- धीरे-धीरे
- पास-पास
- बार-बार
- दिन-प्रतिदिन
(ख) भिन्न-भिन्न शब्दों वाले शब्द-युग्म
इस वाक्य में भी आपको दो शब्द-युग्म दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इन शब्द-युग्मों के दोनों शब्द भिन्न-भिन्न हैं, एक जैसे नहीं हैं।
- खेल-कूद
- हँसी-मजाक
- लेन-देन
- रहन-सहन
- आना-जाना
(ग) दिए गए वाक्यों पर ध्यान दीजिए
“आज मैं जहाँ भी जाता हूँ बच्चे व बूढ़े मुझे घेर लेते हैं।”
📢 बात पर बल देना
“मैंने तो अपना बदला ले लिया है।”
इन दोनों वाक्यों में क्या अंतर है? ध्यान दीजिए और बताइए। सही पहचाना! दूसरे वाक्य में एक शब्द कम है। उस एक शब्द के न होने से वाक्य के अर्थ में भी थोड़ा अंतर आ गया है।
हम अपनी बात पर बल देने के लिए कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे— ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ आदि।
- खेल में तो यह सब चलता ही था।
- अब हर समय मुझे ही देखता रहता था।
- मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है।
- मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं।
प्रभाव: ‘ही’, ‘भी’ और ‘तो’ जैसे शब्द वाक्य में किसी बात पर विशेष बल देते हैं। इनके हटने पर वाक्य का जोर कम हो जाता है।
🏑 पाठ से आगे — आपकी बात
📰 समाचार-पत्र से
➖ योजक चिह्न का प्रयोग
इन वाक्यों में जिन शब्दों के नीचे रेखा खिंची है, उन्हें ध्यान से पढ़िए। हम इन शब्दों को योजक की सहायता से भी लिख सकते हैं, जैसे— हार-जीत, बच्चे-बूढ़े आदि।
| दिए गए शब्द | योजक के साथ |
|---|---|
| अच्छा या बुरा | अच्छा-बुरा |
| छोटा या बड़ा | छोटा-बड़ा |
| अमीर और गरीब | अमीर-गरीब |
| उत्तर और दक्षिण | उत्तर-दक्षिण |
| गुरु और शिष्य | गुरु-शिष्य |
| अमृत या विष | अमृत-विष |
📔 डायरी का प्रारंभ
कुछ लोग प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी बातें किसी स्थान पर लिख लेते हैं। जो वे सोचते हैं, या जो उनके साथ उस दिन हुआ या जो उन्होंने देखा, उसे ईमानदारी से लिख लेते हैं या टाइप कर लेते हैं। इसे डायरी लिखना कहते हैं।
- आप जहाँ लिखेंगे, वह माध्यम चुन लीजिए। आप किसी लेखन-पुस्तिका में या ऑनलाइन मंचों पर लिख सकते हैं।
- आप प्रतिदिन, कुछ दिनों में एक बार या जब कुछ लिखने का मन करे तब लिख सकते हैं।
- शब्दों या वाक्यों की कोई सीमा नहीं है चाहे दो वाक्य हों या दो पृष्ठ। आप जो मन में आए उसे उचित और शालीन शब्दों में लिख सकते हैं।
आज हमारे विद्यालय में हॉकी का खेल हुआ। मैंने अपने मित्रों के साथ खेल का आनंद लिया। मैंने सीखा कि जीत से अधिक जरूरी मिलकर खेलना और एक-दूसरे की सहायता करना है।
🧩 आज की पहेली
यहाँ एक रोचक पहेली दी गई है। इसमें आपको तीन खिलाड़ी दिखाई दे रहे हैं। आपको पता लगाना है कि कौन-से खिलाड़ी द्वारा गोल किया जाएगा—
नोट: इस प्रश्न का उत्तर पुस्तक में दिए गए मूल चित्र को देखकर निर्धारित किया जाना है। यहाँ मूल चित्र उपलब्ध न होने के कारण खिलाड़ी का क्रम निश्चित नहीं किया जा सकता।
🔍 झरोखे से
आपने हॉकी के बारे में बहुत-कुछ बात की होगी। अब हम हॉकी जैसे ही अनोखे खेल के बारे में पढ़ेंगे जिसे आप जैसे लाखों बच्चे अपनी गली-मोहल्लों में खेलते हैं। इस खेल का नाम है— डाँडी या गोथा।
🏏 डाँडी या गोथा
यह भील-भिलाला बच्चों का खेल है। ‘डाँडी’ और ‘गोथा’ शब्द का अर्थ एक ही है— खेलने की हाथ-लकड़ी। देखा जाए तो यह खेल काफी-कुछ हमारे खेल हॉकी जैसा है।
अंतर बस इतना है कि हॉकी में गोल करने के लिए गोलपोस्ट होते हैं, जबकि इस खेल में ऐसा कोई निर्धारण नहीं है। दूसरा अंतर यह है कि भील-भिलाला बच्चों की यह गेंद, हॉकी की अपेक्षा एकदम साधारण होती है। यह बाँस की बनी होती है।
🎯 खेल सामग्री
- बाँस के गुट्टे की गेंद जिसे ‘दईत’ कहते हैं।
- ‘गोथा’ यानी अंग्रेजी के ‘L’ अक्षर की तरह नीचे से मुड़ी हुई बाँस की डंडियाँ।
- राख से खेल के मैदान में सीमांकन करना और घेरे के भीतर एक छोटा वृत्त बनाना।
▶️ कैसे खेलें
- वैसे तो इसे चाहे जितने खिलाड़ी खेल सकते हैं, मगर दोनों दलों में कम से कम दो-दो खिलाड़ी हों।
- टॉस करना। टॉस जीतने वाला दल खेल प्रारंभ करेगा।
- गेंद को छोटे घेरे या वृत्त में रखना। हमला करने वाले दल के खिलाड़ी खेल प्रारंभ होते ही बॉल को पीटते हुए बचाव दल के दायरे में दूर तक ले जाना चाहते हैं।
- दोनों दलों के एक-एक खिलाड़ी अपनी-अपनी तरफ की ‘डी’ में खड़े रहते हैं। वे प्रयास करते हैं कि गेंद रेखा पार न करे।
- खिलाड़ी डाँडी या गोथा के दोनों ओर से खेल सकते हैं, जबकि ऐसी सुविधा हॉकी के खेल में नहीं है।
- बाकी सारा खेल हॉकी के खेल के समान होता है। प्रश्न उठता है कि इस खेल में गोलपोस्ट नहीं होते यानी गोल करने का मामला नहीं बनता, तो हार-जीत का निर्णय कैसे किया जाता है? उत्तर यह है कि जो दल गेंद को अधिक से अधिक बार विरोधी के पाले में ढकेलता है, वही बलवान है और इसलिए विजयी भी।
⭐ खेल के दो विशेष नियम
7. खेल के दो विशेष नियम हैं। पहला, गेंद को शरीर के किसी भी अंग से न छूना, न रोकना। दूसरा, गेंद को हवाई शॉट न मारना और न उसे हवा में शॉट खेलकर साथी खिलाड़ी को पास देना।
बाकी लकड़ी से आप गेंद को रोक सकते हैं या हिट कर सकते हैं। आगे जैसा कि बता चुके हैं, जो दल बीच की रेखा को पार करके विरोधी दल के क्षेत्र में अधिक से अधिक दबाव या प्रवेश बनाए रखता है, वह विजयी होता है।
🤝 साझी समझ
- दो दल बनाए जाते हैं।
- दोनों दलों के खिलाड़ी अपनी-अपनी सीमा में रहते हैं।
- एक खिलाड़ी विरोधी दल के क्षेत्र में जाता है।
- वह विरोधी खिलाड़ी को छूकर वापस आने का प्रयास करता है।
- नियमों का पालन करते हुए अधिक अंक पाने वाला दल विजयी होता है।
🔎 खोजबीन के लिए
नीचे ध्यानचंद जी के विषय में कुछ सामग्री दी गई है जैसे— फिल्में, साक्षात्कार आदि, इन्हें पुस्तक में दिए गए क्यू.आर.कोड की सहायता से पढ़ें, देखें व समझें।
- हॉकी के जादूगर – मेजर ध्यानचंद – प्रेरक गाथाएँ
- हॉकी के जादूगर – मेजर ध्यानचंद
- ओलंपिक
- मेजर ध्यानचंद से साक्षात्कार
⭐ त्वरित पुनरावृत्ति — Quick Revision
| बिंदु | याद रखने योग्य बात |
|---|---|
| पाठ का नाम | गोल |
| मुख्य व्यक्ति | मेजर ध्यानचंद |
| प्रसिद्ध नाम | हॉकी का जादूगर |
| जन्म | सन् 1905, प्रयाग |
| बाद में | परिवार झाँसी आकर बसा |
| सेना में भर्ती | 16 वर्ष की उम्र में |
| महत्वपूर्ण ओलंपिक | 1936 बर्लिन ओलंपिक |
| भूमिका | भारतीय हॉकी टीम के कप्तान |
| परिणाम | भारत को स्वर्ण पदक |
| सफलता के मंत्र | लगन, साधना और खेल भावना |
| मुख्य सीख | गुस्से का उत्तर हिंसा से नहीं, अच्छे व्यवहार और अच्छे काम से देना चाहिए। |
📖 महत्वपूर्ण शब्द और अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| धक्का-मुक्की | एक-दूसरे को धक्का देना |
| नोंक-झोंक | हल्की बहस या तकरार |
| मुकाबला | प्रतियोगिता या खेल की भिड़ंत |
| साधना | लगातार अभ्यास और मेहनत |
| लगन | किसी काम को करने की गहरी इच्छा और मेहनत |
| नौसिखिया | जिसे किसी काम का अभी कम अनुभव हो |
| निखार | गुण या कौशल में सुधार |
| तरक्की | उन्नति |
| श्रेय | किसी अच्छे काम का सम्मान या प्रशंसा |
| खेल भावना | नियमों का पालन करते हुए मिल-जुलकर खेलना |
| छावनी | सैनिकों के रहने का क्षेत्र |
| विजयी | जीतने वाला |
💡 अध्याय से मिलने वाली सीख
- सफलता मेहनत और अभ्यास से मिलती है।
- खेल में नियमों का पालन करना चाहिए।
- गुस्से में गलत काम नहीं करना चाहिए।
- दूसरों को भी आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए।
- अच्छी खेल भावना खिलाड़ी को महान बनाती है।
- हार और जीत को व्यक्तिगत अहंकार का विषय नहीं बनाना चाहिए।
- देश के लिए खेलना गर्व की बात है।
🧠 परीक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न
🖼️ चित्र स्रोत
इस पृष्ठ में उपयोग किया गया मेजर ध्यानचंद का ऐतिहासिक चित्र Wikimedia Commons से लिया गया है। वेबसाइट पर चित्र का उपयोग करते समय मूल स्रोत और उसकी लाइसेंस शर्तों को भी जाँच लें।
कक्षा 6 हिंदी मल्हार अध्याय 2 के लिए यह आसान और उपयोगी worksheet अभ्यास के लिए तैयार की गई है।इसमें पाठ से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न, शब्दार्थ और समझ पर आधारित प्रश्न शामिल हैं।
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