Class 6 Hindi Chapter 2 – गोल | Notes, Solutions & Worksheet

Class 6 Hindi मल्हार Chapter 2 गोल – आसान नोट्स, सारांश, शब्दार्थ, NCERT पुस्तक के प्रश्न-उत्तर, अतिरिक्त प्रश्न और worksheet। पाठ को सरल भाषा में समझें और परीक्षा की तैयारी करें।6

कक्षा 6 हिंदी मल्हार अध्याय 2 गोल – संपूर्ण पाठ, प्रश्न उत्तर और नोट्स

गोल

कक्षा 6 हिंदी — मल्हार | अध्याय 2

मेजर ध्यानचंद के जीवन, खेल भावना, अनुशासन, मेहनत और दूसरों को अवसर देने की प्रेरक कहानी

📚 अध्याय का सारांश

‘गोल’ प्रसिद्ध भारतीय हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के संस्मरण का एक अंश है। इस पाठ में उनके हॉकी जीवन, खेल कौशल, खेल भावना, मेहनत और अच्छे व्यवहार की झलक मिलती है।

एक हॉकी मैच के दौरान एक खिलाड़ी ने गुस्से में ध्यानचंद के सिर पर हॉकी स्टिक मार दी। कुछ देर बाद पट्टी बाँधकर मैदान में लौटे ध्यानचंद ने उससे कहा कि वे अपना बदला जरूर लेंगे। लेकिन उन्होंने बदला किसी गलत तरीके से नहीं लिया। उन्होंने लगातार छह गोल किए और खेल समाप्त होने के बाद उसे समझाया कि खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं है।

इस घटना से पता चलता है कि ध्यानचंद खेल को सही भावना से खेलते थे। वे केवल स्वयं गोल करने पर ध्यान नहीं देते थे, बल्कि गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने साथी खिलाड़ी को पास करते थे ताकि उसे भी गोल करने का अवसर मिले।

ध्यानचंद का जन्म सन् 1905 में प्रयाग में हुआ। बाद में उनका परिवार झाँसी आकर बस गया। वे 16 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुए। उनकी रेजिमेंट हॉकी के लिए प्रसिद्ध थी। शुरुआत में उन्हें हॉकी में विशेष रुचि नहीं थी, लेकिन अभ्यास, लगन और साधना से वे एक महान खिलाड़ी बने।

सन् 1936 के बर्लिन ओलंपिक में वे भारतीय हॉकी टीम के कप्तान बने। उनके शानदार खेल से प्रभावित होकर लोगों ने उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहना शुरू किया। भारत ने बर्लिन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता।

मुख्य संदेश: सफलता का कोई जादुई मंत्र नहीं होता। लगन, साधना, अनुशासन, अभ्यास और खेल भावना सफलता के महत्वपूर्ण आधार हैं।
याद रखने की बात:
मेजर ध्यानचंद = हॉकी का जादूगर + लगन + साधना + खेल भावना + साथियों को अवसर + देश के लिए खेलना।

🌟 पाठ का परिचय

इस पाठ का नाम पढ़कर आपके मन में कुछ गोल वस्तुओं के नाम या चित्र उभरे होंगे, गोल गेंद, गोल रोटी, गोल चंद्रमा आदि। लेकिन यह पाठ एक विशेष प्रकार के गोल और उसे करने वाले के बारे में है। यह पाठ एक प्रसिद्ध खिलाड़ी के संस्मरण का एक अंश है। आइए, इसे पढ़ते हैं और जानते हैं कि कौन थे वे प्रसिद्ध खिलाड़ी!

मेजर ध्यानचंद 1936 हॉकी

मेजर ध्यानचंद — 1936 ओलंपिक से संबंधित चित्र।

लेखक: मेजर ध्यानचंद
जीवनकाल: 1905–1979
प्रसिद्ध नाम: हॉकी का जादूगर

📖 पाठ का पूरा अंश

खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं। खेल में तो यह सब चलता ही था। जिन दिनों हम खेला करते थे, उन दिनों भी यह सब चलता था। सन 1933 की बात है। उन दिनों में, मैं पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था। एक दिन ‘पंजाब रेजिमेंट’ और ‘सैंपर्स एंड माइनर्स टीम’ के बीच मुकाबला हो रहा था।

‘माइनर्स टीम’ के खिलाड़ी मुझसे गेंद छीनने की कोशिश करते, लेकिन उनकी हर कोशिश बेकार जाती। इतने में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी स्टिक मेरे सिर पर दे मारी। मुझे मैदान से बाहर ले जाया गया।

थोड़ी देर बाद मैं पट्टी बाँधकर फिर मैदान में आ पहुँचा। आते ही मैंने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा, “तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं जरूर लूँगा।”

मेरे इतना कहते ही वह खिलाड़ी घबरा गया। अब हर समय मुझे ही देखता रहता था कि मैं कब उसके सिर पर हॉकी स्टिक मारने वाला हूँ।

मैंने एक के बाद एक झटपट छह गोल कर दिए। खेल खत्म होने के बाद मैंने फिर उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और कहा, “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।”

वह खिलाड़ी सचमुच बड़ा शर्मिंदा हुआ। तो देखा आपने मेरा बदला लेने का ढंग? सच मानो, बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।

आज मैं जहाँ भी जाता हूँ बच्चे व बूढ़े मुझे घेर लेते हैं और मुझसे मेरी सफलता का राज जानना चाहते हैं। मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं। हर किसी से यही कहता कि लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़े मंत्र हैं।

मेरा जन्म सन् 1905 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ। बाद में हम झाँसी आकर बस गए। 16 साल की उम्र में मैं ‘फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट’ में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हो गया। मेरी रेजिमेंट का हॉकी खेल में काफी नाम था।

पर खेल में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी। उस समय हमारी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी थे। वे बार-बार मुझे हॉकी खेलने के लिए कहते। हमारी छावनी में हॉकी खेलने का कोई निश्चित समय नहीं था। सैनिक जब चाह मैदान में पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर देते। उस समय तक मैं एक नौसिखिया खिलाड़ी था।

जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई। सन् 1936 में बर्लिन ओलंपिक में मुझे कप्तान बनाया गया। उस समय मैं सेना में लांस नायक था।

बर्लिन ओलंपिक में लोग मेरे हॉकी खेलने के ढंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे ‘हॉकी का जादूगर’ कहना शुरू कर दिया। इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था। मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए।

अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया। बर्लिन ओलंपिक में हमें स्वर्ण पदक मिला। खेलते समय मैं हमेशा इस बात का ध्यान रखता था कि हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।

— मेजर ध्यानचंद
भारतीय हॉकी टीम ने 1936 के बर्लिन ओलंपिक में जीत दर्ज की।

📝 पाठ से — मेरी समझ से

(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा () बनाइए—

(1) “दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं। मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। अगर तुम मुझे हॉकी नहीं मारते तो शायद मैं तुम्हें दो ही गोल से हराता।” मेजर ध्यानचंद की इस बात से उनके बारे में क्या पता चलता है?
वे अत्यंत क्रोधी थे।
वे अच्छे ढंग से बदला लेते थे।
उन्हें हॉकी से मारने पर वे अधिक गोल करते थे।
★ वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए।
उत्तर: वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए।
(2) लोगों ने मेजर ध्यानचंद को ‘हॉकी का जादूगर’ कहना क्यों शुरू कर दिया?
★ उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण
उनकी हॉकी स्टिक की अनोखी विशेषताओं के कारण
हॉकी के लिए उनके विशेष लगाव के कारण
उनकी खेल भावना के कारण
उत्तर: उनके हॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण।

(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

संभावित उत्तर: पहले प्रश्न का उत्तर इसलिए सही है क्योंकि ध्यानचंद ने गुस्से का बदला हिंसा से नहीं, बल्कि अच्छे खेल से लिया। दूसरे प्रश्न का उत्तर इसलिए सही है क्योंकि उनके खेलने का ढंग बहुत शानदार और प्रभावशाली था।

👤 लेखक से परिचय

मेजर ध्यानचंद (1905–1979)

मेजर ध्यानचंद भारत के प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी थे। उनका जीवन मेहनत, अनुशासन, अभ्यास और खेल भावना का उदाहरण है। लोग उनके शानदार हॉकी कौशल से प्रभावित होकर उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहते थे।

उनके जन्मदिन को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

🔗 मिलकर करें मिलान

पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सही अर्थों या संदर्भों से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।

शब्दसही अर्थ या संदर्भ
1. लांस नायक2. भारतीय सेना का एक पद (रैंक) है।
2. बर्लिन ओलंपिक4. वर्ष 1936 में जर्मनी के बर्लिन शहर में आयोजित ओलंपिक खेल प्रतियोगिता, जिसमें 49 देशों ने भाग लिया था।
3. पंजाब रेजिमेंट5. स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज़ों की भारतीय सेना का एक दल।
4. सैंपर्स एंड माइनर्स टीम6. अंग्रेज़ों के समय का एक हॉकी दल।
5. सूबेदार1. स्वतंत्रता से पहले सूबेदार भारतीय सैन्य अधिकारियों का दूसरा सबसे बड़ा पद था।
6. छावनी3. सैनिकों के रहने का क्षेत्र।
मिलान:
1 → 2   |   2 → 4   |   3 → 5   |   4 → 6   |   5 → 1   |   6 → 3

💬 पंक्तियों पर चर्चा

पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार कक्षा में अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।

(क) “बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।”
उत्तर: जो व्यक्ति दूसरों के साथ बुरा व्यवहार करता है, उसे हमेशा डर रहता है कि उसके साथ भी कोई बुरा व्यवहार कर सकता है।
(ख) “मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मैं गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूँ ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया।”
उत्तर: ध्यानचंद केवल स्वयं गोल करने के बारे में नहीं सोचते थे। वे अपने साथियों को भी गोल करने का अवसर देते थे। यही उनकी अच्छी खेल भावना थी।

🤔 सोच-विचार के लिए

संस्मरण को एक बार फिर से पढ़िए और निम्नलिखित के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए—

(क) ध्यानचंद की सफलता का क्या रहस्य था?
उत्तर: ध्यानचंद की सफलता का रहस्य लगन, साधना, नियमित अभ्यास, अनुशासन और खेल भावना थी।
(ख) किन बातों से ऐसा लगता है कि ध्यानचंद स्वयं से पहले दूसरों को रखते थे?
उत्तर: वे गेंद अपने साथी खिलाड़ी को पास करते थे ताकि वह गोल करके श्रेय पा सके। इससे पता चलता है कि वे दूसरों को भी अवसर देते थे।

📚 संस्मरण की रचना

“उन दिनों में मैं, पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था।”

इस वाक्य को पढ़कर ऐसा लगता है मानो लेखक आपसे यानी पाठक से अपनी यादों को साझा कर रहा है। ध्यान देंगे तो इस पाठ में ऐसी और भी अनेक विशेष बातें आपको दिखाई देंगी।

(क) अपने-अपने समूह में मिलकर इस संस्मरण की विशेषताओं की सूची बनाइए।
संभावित उत्तर:
  • लेखक अपने जीवन की पुरानी घटना बताता है।
  • घटनाएँ प्रथम पुरुष में कही गई हैं।
  • लेखक अपनी यादों और अनुभवों को साझा करता है।
  • घटनाओं के साथ संवाद भी हैं।
  • भाषा सरल और रोचक है।
  • पाठ से जीवन और खेल भावना की सीख मिलती है।
(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।
उत्तर: अपने समूह द्वारा बनाई गई विशेषताओं की सूची कक्षा में मित्रों और शिक्षक के साथ साझा कीजिए।

🔤 शब्दों के जोड़े, विभिन्न प्रकार के

(क) शब्द-युग्म

“जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई।”

इस वाक्य में ‘जैसे-जैसे’ और ‘वैसे-वैसे’ शब्दों के जोड़े हैं जिनमें एक ही शब्द दो बार उपयोग में लाया गया है। ऐसे जोड़ों को ‘शब्द-युग्म’ कहते हैं। शब्द-युग्म में दो शब्दों के बीच में छोटी-सी रेखा लगाई जाती है जिसे योजक चिह्न कहते हैं। योजक यानी जोड़ने वाला।

आप भी ऐसे पाँच शब्द-युग्म लिखिए।
उत्तर:
  • घर-घर
  • धीरे-धीरे
  • पास-पास
  • बार-बार
  • दिन-प्रतिदिन

(ख) भिन्न-भिन्न शब्दों वाले शब्द-युग्म

“खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं।”

इस वाक्य में भी आपको दो शब्द-युग्म दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इन शब्द-युग्मों के दोनों शब्द भिन्न-भिन्न हैं, एक जैसे नहीं हैं।

आप भी ऐसे पाँच शब्द-युग्म लिखिए जिनमें दोनों शब्द भिन्न-भिन्न हों।
उत्तर:
  • खेल-कूद
  • हँसी-मजाक
  • लेन-देन
  • रहन-सहन
  • आना-जाना

(ग) दिए गए वाक्यों पर ध्यान दीजिए

“हार या जीत मेरी नहीं, बल्कि पूरे देश की है।”
“आज मैं जहाँ भी जाता हूँ बच्चे व बूढ़े मुझे घेर लेते हैं।”

📢 बात पर बल देना

“मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है।”

“मैंने तो अपना बदला ले लिया है।”

इन दोनों वाक्यों में क्या अंतर है? ध्यान दीजिए और बताइए। सही पहचाना! दूसरे वाक्य में एक शब्द कम है। उस एक शब्द के न होने से वाक्य के अर्थ में भी थोड़ा अंतर आ गया है।

हम अपनी बात पर बल देने के लिए कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग करते हैं जैसे— ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ आदि।

पाठ में से इन शब्दों वाले वाक्यों को चुनकर लिखिए। ध्यान दीजिए कि यदि उन वाक्यों में ये शब्द न होते तो उनके अर्थ पर इसका क्या प्रभाव पड़ता।
संभावित उत्तर:
  • खेल में तो यह सब चलता ही था।
  • अब हर समय मुझे ही देखता रहता था।
  • मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है।
  • मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं।

प्रभाव: ‘ही’, ‘भी’ और ‘तो’ जैसे शब्द वाक्य में किसी बात पर विशेष बल देते हैं। इनके हटने पर वाक्य का जोर कम हो जाता है।

🏑 पाठ से आगे — आपकी बात

(क) ध्यानचंद के स्थान पर आप होते तो क्या आप बदला लेते? यदि हाँ, तो बताइए कि आप बदला किस प्रकार लेते?
संभावित उत्तर: मैं हिंसा करके बदला नहीं लेता। मैं अच्छे खेल से अपनी क्षमता दिखाता और सामने वाले को समझाता कि खेल में गुस्सा नहीं करना चाहिए।
(ख) आपको कौन-से खेल और कौन-से खिलाड़ी सबसे अधिक अच्छे लगते हैं? क्यों?
संभावित उत्तर: मुझे हॉकी और क्रिकेट अच्छे लगते हैं। मुझे वे खिलाड़ी पसंद हैं जो मेहनत करते हैं, नियमों का पालन करते हैं और अपने साथियों का सम्मान करते हैं।

📰 समाचार-पत्र से

(क) क्या आप समाचार-पत्र पढ़ते हैं? समाचार-पत्रों में प्रतिदिन खेल के समाचारों का एक पृष्ठ प्रकाशित होता है। अपने घर या पुस्तकालय से पिछले सप्ताह के समाचार पत्रों को देखिए। अपनी पसंद का एक खेल-समाचार अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
कार्य: पिछले सप्ताह के समाचार-पत्र से अपनी पसंद का कोई खेल-समाचार चुनकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
(ख) मान लीजिए कि आप एक खेल-संवाददाता हैं और किसी खेल का आँखों देखा प्रसारण कर रहे हैं। अपने समूह के साथ मिलकर कक्षा में उस खेल का आँखों देखा हाल प्रस्तुत कीजिए। (संकेत— इस कार्य में आप आकाशवाणी या दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले खेल-प्रसारणों की कमेंटरी की शैली का उपयोग कर सकते हैं। बारी-बारी से प्रत्येक समूह कक्षा में सामने डेस्क या कुर्सियों पर बैठ जाएगा और पाँच मिनट के लिए किसी खेल के सजीव प्रसारण की कमेंटरी का अभिनय करेगा।)
कार्य: समूह बनाकर पाँच मिनट की खेल-कमेंटरी तैयार कीजिए। एक विद्यार्थी कमेंटेटर बन सकता है और अन्य विद्यार्थी खिलाड़ी।

➖ योजक चिह्न का प्रयोग

इन वाक्यों में जिन शब्दों के नीचे रेखा खिंची है, उन्हें ध्यान से पढ़िए। हम इन शब्दों को योजक की सहायता से भी लिख सकते हैं, जैसे— हार-जीत, बच्चे-बूढ़े आदि।

आप नीचे दिए गए शब्दों को योजक की सहायता से लिखिए—
दिए गए शब्दयोजक के साथ
अच्छा या बुराअच्छा-बुरा
छोटा या बड़ाछोटा-बड़ा
अमीर और गरीबअमीर-गरीब
उत्तर और दक्षिणउत्तर-दक्षिण
गुरु और शिष्यगुरु-शिष्य
अमृत या विषअमृत-विष

📔 डायरी का प्रारंभ

कुछ लोग प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी बातें किसी स्थान पर लिख लेते हैं। जो वे सोचते हैं, या जो उनके साथ उस दिन हुआ या जो उन्होंने देखा, उसे ईमानदारी से लिख लेते हैं या टाइप कर लेते हैं। इसे डायरी लिखना कहते हैं।

क्या आप भी अपने मन की बातों और विचारों को लिखना चाहते हैं? यदि हाँ, तो आज से ही प्रारंभ कर दीजिए—
  • आप जहाँ लिखेंगे, वह माध्यम चुन लीजिए। आप किसी लेखन-पुस्तिका में या ऑनलाइन मंचों पर लिख सकते हैं।
  • आप प्रतिदिन, कुछ दिनों में एक बार या जब कुछ लिखने का मन करे तब लिख सकते हैं।
  • शब्दों या वाक्यों की कोई सीमा नहीं है चाहे दो वाक्य हों या दो पृष्ठ। आप जो मन में आए उसे उचित और शालीन शब्दों में लिख सकते हैं।
छोटी डायरी का उदाहरण:

आज हमारे विद्यालय में हॉकी का खेल हुआ। मैंने अपने मित्रों के साथ खेल का आनंद लिया। मैंने सीखा कि जीत से अधिक जरूरी मिलकर खेलना और एक-दूसरे की सहायता करना है।

🧩 आज की पहेली

यहाँ एक रोचक पहेली दी गई है। इसमें आपको तीन खिलाड़ी दिखाई दे रहे हैं। आपको पता लगाना है कि कौन-से खिलाड़ी द्वारा गोल किया जाएगा—

🏑 ⚽ 🧑‍🏫

नोट: इस प्रश्न का उत्तर पुस्तक में दिए गए मूल चित्र को देखकर निर्धारित किया जाना है। यहाँ मूल चित्र उपलब्ध न होने के कारण खिलाड़ी का क्रम निश्चित नहीं किया जा सकता।

🔍 झरोखे से

आपने हॉकी के बारे में बहुत-कुछ बात की होगी। अब हम हॉकी जैसे ही अनोखे खेल के बारे में पढ़ेंगे जिसे आप जैसे लाखों बच्चे अपनी गली-मोहल्लों में खेलते हैं। इस खेल का नाम है— डाँडी या गोथा।

🏏 डाँडी या गोथा

यह भील-भिलाला बच्चों का खेल है। ‘डाँडी’ और ‘गोथा’ शब्द का अर्थ एक ही है— खेलने की हाथ-लकड़ी। देखा जाए तो यह खेल काफी-कुछ हमारे खेल हॉकी जैसा है।

अंतर बस इतना है कि हॉकी में गोल करने के लिए गोलपोस्ट होते हैं, जबकि इस खेल में ऐसा कोई निर्धारण नहीं है। दूसरा अंतर यह है कि भील-भिलाला बच्चों की यह गेंद, हॉकी की अपेक्षा एकदम साधारण होती है। यह बाँस की बनी होती है।

🎯 खेल सामग्री

  1. बाँस के गुट्टे की गेंद जिसे ‘दईत’ कहते हैं।
  2. ‘गोथा’ यानी अंग्रेजी के ‘L’ अक्षर की तरह नीचे से मुड़ी हुई बाँस की डंडियाँ।
  3. राख से खेल के मैदान में सीमांकन करना और घेरे के भीतर एक छोटा वृत्त बनाना।

▶️ कैसे खेलें

  1. वैसे तो इसे चाहे जितने खिलाड़ी खेल सकते हैं, मगर दोनों दलों में कम से कम दो-दो खिलाड़ी हों।
  2. टॉस करना। टॉस जीतने वाला दल खेल प्रारंभ करेगा।
  3. गेंद को छोटे घेरे या वृत्त में रखना। हमला करने वाले दल के खिलाड़ी खेल प्रारंभ होते ही बॉल को पीटते हुए बचाव दल के दायरे में दूर तक ले जाना चाहते हैं।
  4. दोनों दलों के एक-एक खिलाड़ी अपनी-अपनी तरफ की ‘डी’ में खड़े रहते हैं। वे प्रयास करते हैं कि गेंद रेखा पार न करे।
  5. खिलाड़ी डाँडी या गोथा के दोनों ओर से खेल सकते हैं, जबकि ऐसी सुविधा हॉकी के खेल में नहीं है।
  6. बाकी सारा खेल हॉकी के खेल के समान होता है। प्रश्न उठता है कि इस खेल में गोलपोस्ट नहीं होते यानी गोल करने का मामला नहीं बनता, तो हार-जीत का निर्णय कैसे किया जाता है? उत्तर यह है कि जो दल गेंद को अधिक से अधिक बार विरोधी के पाले में ढकेलता है, वही बलवान है और इसलिए विजयी भी।

⭐ खेल के दो विशेष नियम

7. खेल के दो विशेष नियम हैं। पहला, गेंद को शरीर के किसी भी अंग से न छूना, न रोकना। दूसरा, गेंद को हवाई शॉट न मारना और न उसे हवा में शॉट खेलकर साथी खिलाड़ी को पास देना।

बाकी लकड़ी से आप गेंद को रोक सकते हैं या हिट कर सकते हैं। आगे जैसा कि बता चुके हैं, जो दल बीच की रेखा को पार करके विरोधी दल के क्षेत्र में अधिक से अधिक दबाव या प्रवेश बनाए रखता है, वह विजयी होता है।

विशेष— यह खेल होली का त्योहार आने के कुछ दिन पहले से खेला जाता है। अंत में जिस दिन होलिका जलाई जाती है, उस दिन ये दईत और गोथे (गेंद और डंडे) आग में डाल दिए जाते हैं।

🤝 साझी समझ

(क) आपने इस खेल के नियम पढ़कर अच्छी तरह समझ लिए हैं। अब अपने मित्रों के साथ मिलकर ‘डाँडी’ या ‘गोथा’ खेल खेलिए।
कार्य: शिक्षक की देखरेख में मित्रों के साथ खेल के नियमों का पालन करते हुए ‘डाँडी’ या ‘गोथा’ खेलिए।
(ख) आप भी ‘डाँडी’ या ‘गोथा’ जैसे अनेक स्वदेशी खेल अपने मित्रों के साथ मिलकर अपने विद्यालय, घर या मोहल्ले में खेलते होंगे। अब आप ऐसे ही किसी एक खेल के नियम इस प्रकार से लिखिए कि उन्हें पढ़कर कोई भी बच्चा उस खेल को समझ सके और खेल सके।
संभावित उदाहरण — कबड्डी:
  1. दो दल बनाए जाते हैं।
  2. दोनों दलों के खिलाड़ी अपनी-अपनी सीमा में रहते हैं।
  3. एक खिलाड़ी विरोधी दल के क्षेत्र में जाता है।
  4. वह विरोधी खिलाड़ी को छूकर वापस आने का प्रयास करता है।
  5. नियमों का पालन करते हुए अधिक अंक पाने वाला दल विजयी होता है।

🔎 खोजबीन के लिए

नीचे ध्यानचंद जी के विषय में कुछ सामग्री दी गई है जैसे— फिल्में, साक्षात्कार आदि, इन्हें पुस्तक में दिए गए क्यू.आर.कोड की सहायता से पढ़ें, देखें व समझें।

  • हॉकी के जादूगर – मेजर ध्यानचंद – प्रेरक गाथाएँ
  • हॉकी के जादूगर – मेजर ध्यानचंद
  • ओलंपिक
  • मेजर ध्यानचंद से साक्षात्कार

⭐ त्वरित पुनरावृत्ति — Quick Revision

बिंदुयाद रखने योग्य बात
पाठ का नामगोल
मुख्य व्यक्तिमेजर ध्यानचंद
प्रसिद्ध नामहॉकी का जादूगर
जन्मसन् 1905, प्रयाग
बाद मेंपरिवार झाँसी आकर बसा
सेना में भर्ती16 वर्ष की उम्र में
महत्वपूर्ण ओलंपिक1936 बर्लिन ओलंपिक
भूमिकाभारतीय हॉकी टीम के कप्तान
परिणामभारत को स्वर्ण पदक
सफलता के मंत्रलगन, साधना और खेल भावना
मुख्य सीखगुस्से का उत्तर हिंसा से नहीं, अच्छे व्यवहार और अच्छे काम से देना चाहिए।

📖 महत्वपूर्ण शब्द और अर्थ

शब्दअर्थ
धक्का-मुक्कीएक-दूसरे को धक्का देना
नोंक-झोंकहल्की बहस या तकरार
मुकाबलाप्रतियोगिता या खेल की भिड़ंत
साधनालगातार अभ्यास और मेहनत
लगनकिसी काम को करने की गहरी इच्छा और मेहनत
नौसिखियाजिसे किसी काम का अभी कम अनुभव हो
निखारगुण या कौशल में सुधार
तरक्कीउन्नति
श्रेयकिसी अच्छे काम का सम्मान या प्रशंसा
खेल भावनानियमों का पालन करते हुए मिल-जुलकर खेलना
छावनीसैनिकों के रहने का क्षेत्र
विजयीजीतने वाला

💡 अध्याय से मिलने वाली सीख

  • सफलता मेहनत और अभ्यास से मिलती है।
  • खेल में नियमों का पालन करना चाहिए।
  • गुस्से में गलत काम नहीं करना चाहिए।
  • दूसरों को भी आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए।
  • अच्छी खेल भावना खिलाड़ी को महान बनाती है।
  • हार और जीत को व्यक्तिगत अहंकार का विषय नहीं बनाना चाहिए।
  • देश के लिए खेलना गर्व की बात है।

🧠 परीक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न

1. मेजर ध्यानचंद को ‘हॉकी का जादूगर’ क्यों कहा गया?
उनके शानदार और विशेष हॉकी कौशल के कारण उन्हें ‘हॉकी का जादूगर’ कहा गया।
2. ध्यानचंद ने अपने ऊपर हुए हमले का बदला कैसे लिया?
उन्होंने हिंसा से बदला नहीं लिया। उन्होंने छह गोल करके अपना बदला लिया और खिलाड़ी को खेल भावना का महत्व समझाया।
3. ध्यानचंद की सफलता के सबसे बड़े मंत्र क्या थे?
लगन, साधना और खेल भावना।
4. ध्यानचंद अपने साथियों को गोल करने का अवसर क्यों देते थे?
वे चाहते थे कि उनके साथी खिलाड़ी भी गोल करने का श्रेय प्राप्त करें।
5. ‘डाँडी या गोथा’ खेल किससे मिलता-जुलता है?
यह खेल काफी-कुछ हॉकी जैसा है।

🖼️ चित्र स्रोत

इस पृष्ठ में उपयोग किया गया मेजर ध्यानचंद का ऐतिहासिक चित्र Wikimedia Commons से लिया गया है। वेबसाइट पर चित्र का उपयोग करते समय मूल स्रोत और उसकी लाइसेंस शर्तों को भी जाँच लें।

कक्षा 6 हिंदी — मल्हार | अध्याय 2 — गोल

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कक्षा 6 हिंदी मल्हार अध्याय 2 के लिए यह आसान और उपयोगी worksheet अभ्यास के लिए तैयार की गई है।इसमें पाठ से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न, शब्दार्थ और समझ पर आधारित प्रश्न शामिल हैं।

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