भारति, जय, विजय करो!
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
पूर्ण कविता
भारति, जय, विजय करो!
भारति, जय, विजय करो!
कनक-शस्य-कमल धरे!
लंका पदतल शतदल
गर्जितोर्मि सागर-जल,
धोता-शुचि चरण युगल
स्तव कर बहु-अर्थ-भरे।
तरु-तृण-वन-लता वसन,
अंचल में खचित सुमन,
गंगा ज्योतिर्जल-कण
धवल धार हार गले।
मुकुट शुभ्र हिम-तुषार
प्राण प्रणव ओंकार,
ध्वनित दिशाएँ उदार,
शतमुख-शतरव-मुखरे!
निराला की इस संगीतात्मक कविता को पढ़कर आनंद लीजिए।
विस्तार से इस कविता को आप आगे की कक्षा में पढ़ेंगे।
कविता का संक्षिप्त भावार्थ
इस कविता में कवि ने भारत माता की महिमा और सुंदरता का गुणगान किया है। कवि भारत की धरती, प्रकृति, नदियों और प्राकृतिक सौंदर्य को बहुत सुंदर रूप में प्रस्तुत करता है।
कवि भारत माता से विजय और गौरव की कामना करता है। भारत की धरती को स्वर्णिम फसलों और कमलों से सजी हुई बताया गया है तथा गंगा के पवित्र जल का सुंदर चित्रण किया गया है।
संबंधित प्रश्न और संक्षिप्त उत्तर
1. कविता के कवि कौन हैं?
2. कविता में किसकी जय और विजय की कामना की गई है?
3. ‘कनक-शस्य-कमल’ से क्या भाव प्रकट होता है?
4. कविता में किस नदी का उल्लेख किया गया है?
5. ‘गंगा ज्योतिर्जल-कण’ से क्या तात्पर्य है?
6. भारत माता का मुकुट किसे कहा गया है?
7. ‘तरु-तृण-वन-लता वसन’ का क्या अर्थ है?
8. कवि ने भारत की प्रकृति का चित्रण कैसे किया है?
9. कविता में ‘प्रणव ओंकार’ का क्या संकेत है?
10. ‘शतमुख-शतरव-मुखरे’ से क्या भाव व्यक्त होता है?
11. कविता में भारत माता के चरणों को किससे धोया गया है?
12. कविता का मुख्य भाव क्या है?
13. कविता में भारत की धरती को किस प्रकार दिखाया गया है?
14. इस कविता से हमें क्या प्रेरणा मिलती है?
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
कनक — सोना
शस्य — फसल
पदतल — पैरों के नीचे
शतदल — सौ पंखुड़ियों वाला कमल
गर्जितोर्मि — गर्जना करती लहरें
शुचि — पवित्र
स्तव — स्तुति / प्रशंसा
सुमन — फूल
धवल — सफेद
तुषार — ओस / हिमकण
उदार — विशाल / महान